
कब से शुरू हो रहा है 5 दिनों का यह उत्सव, जान लें शारदीय नवरात्र से कैसे है अलग?
आश्विन माह में कई व्रत और पर्व मनाए जाते हैं, जिनमें दुर्गा पूजा (Durga Puja 2026) और शारदीय नवरात्र भी शामिल हैं। ये उत्सव मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए शुभ माने जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दौरान सच्चे मन से मां दुर्गा की साधना करने से जीवन में आने वाले सभी दुख-दर्द दूर हो जाते हैं और साधक को शुभ परिणाम मिलते हैं।
अक्सर लोग दुर्गा पूजा और शारदीय नवरात्र को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इन दोनों त्योहारों की सांस्कृतिक परंपराएं, पूजा-पद्धति और मान्यताएं काफी अलग हैं। दुर्गा पूजा का पर्व पूर्वी भारत में बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है। वहीं, शारदीय नवरात्र का पर्व उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत में मनाया जाता है। आइए इस आर्टिकल में आपको विस्तार से बताते हैं कि दुर्गा पूजा और शारदीय नवरात्र में क्या अंतर है।
दुर्गा पूजा 2026 कब से शुरू होगी?पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में दुर्गा पूजा की शुरुआत 16 अक्टूबर से होगी और इसका समापन 21 अक्टूबर को होगा।
शारदीय नवरात्रशारदीय नवरात्र के 9 दिनों तक देवी के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-अर्चना करने का विशेष महत्व है। साथ ही मां दुर्गा की कृपा प्राप्त करने के लिए व्रत भी रखा जाता है। शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन घटस्थापना करने का विधान है और मां दुर्गा की चौकी लगाई जाती है। शारदीय नवरात्र की शुरुआत आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है। वहीं, इसका समापन नवमी तिथि पर होता है। नवरात्र की अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन किया जाता है।
दुर्गा पूजाइस उत्सव को देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध के जश्न के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान मां दुर्गा की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान है। यह उत्सव पांच दिनों तक चलता है। इस दौरान धुनुची नृत्य और महिलाओं द्वारा खेले जाने वाले ‘सिंदूर खेला’ की परंपरा निभाई जाती है।
वैसे दुर्गा पूजा की शुरुआत शारदीय नवरात्र से एक दिन पहले होती है, लेकिन इसका मुख्य उत्सव 5 दिनों का होता है, जो षष्ठी तिथि से शुरू होता है। शारदीय नवरात्र से एक दिन पहले चंडी पाठ सुना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन मां दुर्गा कैलाश पर्वत से पृथ्वी की ओर अपनी यात्रा शुरू करती हैं। वहीं, षष्ठी तिथि के दिन पंडालों में मां दुर्गा की मूर्ति का अनावरण किया जाता है और प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है।
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