फांसी का फैसला सुनाते ही डस्टबिन में फेंका पेन, चर्चा में जज अरविंद मिश्रा

मेरठ: मेरठ की मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को फांसी की सजा सुनाई गई है. मुस्कान ने साहिल के साथ मिलकर अपने पति सौरभ राजपूत की हत्या कर दी थी. बाद में उसके शव के टुकड़े-टुकड़े कर नीले ड्रम में भर दिए थे. करीब 13 महीने तक चले ट्रायल और 126 तारीखों पर सुनवाई के बाद मेरठ के जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा ने दोनों को फांसी की सजा सुनाई.
23 साल बाद मेरठ की अदालत से किसी दोषी को मौत की सजा मिली है. जिस जज ने मुस्कान और साहिल को फांसी की सजा सुनाई है, वह 5 महीने पहले ही मेरठ की अदालत के जज बने थे.
फांसी की सजा सुनाने वाले जज अरविंद कुमार मिश्रा का अंदाज बुधवार को मेरठ कोर्ट में चर्चा का विषय बना रहा. फैसला सुनाने से पहले उन्होंने महाभारत का जिक्र किया. और सजा सुनाने के बाद इस्तेमाल किए गए पेन को डस्टबिन में डाल दिया. उनके इसी अंदाज की खूब चर्चा हो रही है.
महाभारत की दो पंक्तियों से की शुरुआत
जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा ने 30 सितंबर को दोनों को सौरभ राजपूत की हत्या में दोषी करार दिया था. दो हफ्ते बाद उन्होंने दोनों को फांसी की सजा सुनाई.
सजा पर फैसला सुनाने से पहले जज अरविंद कुमार मिश्रा ने महाभारत का जिक्र करते हुए कहा कि अपराधी ने जैसा अपराध किया है, उसके अनुसार उसे दंड देना न्यायिक धर्म है.
इसके बाद उन्होंने बाघ और जंगल का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर बाघ जंगल में है, तो जंगल सुरक्षित है और अगर जंगल बचा है, तो बाघ भी सुरक्षित है. कानून मनुष्य के लिए बनाया गया है, मनुष्यों की सुरक्षा करता है, उनके व्यवहार को नियंत्रित करता है… ये समाज मे संदेश जाना बहुत जरूरी है.
उनकी इस बात को न्याय और व्यवस्था के बीच संतुलन के संदेश के तौर पर देखा जा रहा है. फैसले के बाद उनका अपना पेन डस्टबिन में डालने का अंदाज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है.
मेरठ में करीब 23 साल बाद फांसी की सजा सुनाई गई है. इससे पहले साल 2003 में मेरठ में एक डॉक्टर को फांसी की सजा सुनाई गई थी.
हंसमुख और मिलनसार जज हैं अरविंद कुमार
इलाहाबाद के रहने वाले जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा ने करीब पांच महीने पहले ही मेरठ जिला कोर्ट का कार्यभार संभाला था.
मेरठ जिला कोर्ट में उन्हें मिलनसार और हंसमुख स्वभाव का जज बताया जाता है.
कोर्ट के सरकारी वकील के.के. चौबे के मुताबिक, जज अरविंद कुमार मिश्रा कई गंभीर मामलों और विवादों में वकीलों के बीच पहुंचकर आपसी सुलह कराने के लिए भी जाने जाते रहे हैं.
मेरठ बार एसोसिएशन से जुड़े मामलों में भी उनके इस व्यवहार की चर्चा होती रही है.
2031 में होंगे रिटायर, 2003 से हैं जज
अरविंद कुमार मिश्रा का जन्म 2 जुलाई 1971 को उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में हुआ था. उनके पिता का नाम बीपी मिश्रा है. मूल रूप से मऊ के रहने वाले मिश्रा पिछले करीब 23 साल से ज्यादा समय से न्यायपालिका में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
उन्होंने 1990 में बीए, 1994 में LL.B. और 1996 में LL.M. की डिग्री हासिल की. न्यायिक सेवा में उनकी औपचारिक शुरुआत 31 मई 2003 को उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के रूप में हुई थी.
अपने करियर में उन्होंने यूपी के कई जिलों में अहम जिम्मेदारियां संभाली हैं. उन्होंने गाजीपुर, सुल्तानपुर, अलीगढ़ और गोरखपुर में सिविल जज, एसीजेएम (ACJM), और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के रूप में काम किया. इसके बाद अप्रैल 2014 में उनकी तैनाती कानपुर नगर में अपर जिला जज के रूप में हुई.
वह कानपुर में फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज और उत्तर प्रदेश सरकार में विशेष सचिव और अपर विधि परामर्शदाता (विधायी) के पद पर भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.
इसके अलावा, वह लखनऊ स्थित राज्य परिवहन अपीलीय न्यायाधिकरण के अध्यक्ष भी रहे. नवंबर 2024 में उन्हें मिर्जापुर का जिला जज बनाया गया था.
21 मई 2026 से अरविंद कुमार मिश्रा मेरठ में जिला जज के रूप में तैनात हैं. मिर्जापुर से ट्रांसफर होकर मेरठ आने के महज कुछ ही महीनों के भीतर उनके पाले में देश का यह सबसे सनसनीखेज नीला ड्रम हत्याकांड आया.
जज अरविंद कुमार मिश्रा 31 जुलाई 2031 को रिटायर होंगे.

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