25 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा: क्यों इस दिन भगवान विष्णु के साथ होती है मां लक्ष्मी की पूजा? 

25 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा: क्यों इस दिन भगवान विष्णु के साथ होती है मां लक्ष्मी की पूजा? 

हिंदू पंचांग के मुताबिक, हर साल आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को ‘शरद पूर्णिमा’ (Sharad Purnima 2026) के नाम से जाना जाता है। इस साल यह पूर्णिमा 25 अक्टूबर 2026, रविवार के दिन पड़ रही है। इस दिन पर मां लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व माना गया है। शरद पूर्णिमा साल की एकमात्र ऐसी पूर्णिमा है, जब भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की भी पूजा की जाती है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, दीवाली के मौके पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है, वहीं धनतेरस के अवसर पर कुबेर जी के साथ की जाती है, लेकिन शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima 2026) पर मां लक्ष्मी की पूजा भगवान विष्णु के साथ की जाती है।

शरद पूर्णिमा का धार्मिक महत्वदरअसल हिंदू धर्म में पूर्णिमा भगवान विष्णु को समर्पित तिथि मानी जाती है। इस तिथि को ‘पूर्णमासी’ के नाम से कहा जाता है। भगवान विष्णु की पूजा के मौके पर विशेष स्नान का भी महत्व है।

सामान्यत एक साल में करीब 12 पूर्णिमा आती है और प्रत्येक पूर्णिमा भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित है, लेकिन शरद पूर्णिमा ही एकमात्र ऐसी पूर्णिमा है जिस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ मां लक्ष्मी की भी पूजा की जाती है।

शरद पूर्णिमा के प्रमुख नामभारत वर्ष में शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा, नवन्ना पूर्णिमा, कौमुदी पूर्णिमा और आश्विन पूर्णिमा जैसे कई नामों से जाना जाता है। वहीं इस दिन देश के अलग-अलग हिस्सों में कुंवारी लड़कियां भगवान विष्णु को खुश करने के लिए और उपयुक्त पति की कामना के लिए भी शरद पूर्णिमा का व्रत रखती हैं।

शरद पूर्णिमा और दीवाली की लक्ष्मी पूजा में क्या फर्क है?तिथि और समयशरद पूर्णिमा और दीवाली की लक्ष्मी पूजा में सबसे बड़ा अंतर दोनों की तिथि का है। हिंदू पंचांग के हिसाब से हर साल शरद पूर्णिमा आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है, वहीं दीवाली पर होने वाली लक्ष्मी पूजा कार्तिक मास की अमावस्या को मनाई जाती है।

पूजा का उद्देश्यशरद पूर्णिमा की रात को माना जाता है कि, मां लक्ष्मी धरती पर विचरण करने निकलती हैं और भक्तों से पूछती हैं कि ‘को जाग्रति’ यानी (कौन जाग रहा है?)।

वहीं दीवाली की लक्ष्मी पूजा के दौरान खासतौर पर बही-खातों की पूजा, व्यापार में तरक्की और अंधकार पर रोशनी की जीत का प्रतीक माना जाता है।

प्रसादशरद पूर्णिमा की रात को खुले आसमान के नीचे गाय के दूध से बनी खीर रखी जाती है और माना जाता है कि इस रात चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होकर अमृत वर्षा करता है।

वहीं दीवाली के मौके पर होने वाली लक्ष्मी पूजा के दौरान कोई खास तरह की खीर और चांद की रोशनी का विधान नहीं है, बल्कि मिठाई और खास तरह के व्यजंनों का भोग लगाया जाता है।

उद्देश्यशरद पूर्णिमा का त्योहार देशभर में अलग-अलग सांस्कृतिक और नामों के साथ मनाया जाता है। बंगाल में इसे लक्ष्मी पूर्णिमा, महाराष्ट्र में कोजागिरी और ओडिशा में कुमार पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। शरद पूर्णिमा की रात को भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला से भी जोड़कर देखा जाता है।

वहीं दीवाली पर होने वाली लक्ष्मी पूजा को भगवान श्रीराम के 14 साल बाद वनवास से अयोध्या वापस आने की खुशी में मनाया जाता है।
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