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बर्थडे स्पेशल : अटल बिहारी वाजपेयी के दिलचस्प इंटरव्यू और भाषण

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आज भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्मदिन है. अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में हुआ था. उन्‍होंने न केवल एक बेहतरीन नेता बल्कि एक अच्‍छे कवि के रूप में भी नाम कमाया और एक शानदार वक्ता के रूप में लोगों के दिल जीते.

वाजपेयी ने अपने राजनीतिक करियर के दौरान मीडिया को कई शानदार इंटरव्यू दिए. आज उनके जन्‍मदिन के मौके पर पेश हैं कुछ ऐसे ही इंटरव्यू के अंश जो अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तिगत जीवन के साथ ही उनके राजनैतिक जीवन के बारे में भी बताते हैं. इन इंटरव्‍यू से आपको जिन सवालों के जवाब मिलेंगे उनमें से कुछ इस प्रकार हैं… वाजपेयी राजनीति में क्यों आए? शादी क्यों नहीं कर पाए? अपने अफेयर के बारे में वो क्या कहते हैं? लोकसभा में पंडित नेहरू उन पर क्यों नाराज़ गए थे? क्या क्या खाना बनाना पसंद करते हैं? बाबरी मस्जिद के बारे में क्या सोचते हैं?

1996 में सरकार गिर जाने के बाद लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी के शानदार भाषण के कुछ अंश 

हम भी अपने देश की सेवा कर रहे हैं. अगर हम देशभक्त नहीं होते, अगर हम नि:स्वार्थ भाव से राजनीति में अपना स्थान बनाने का प्रयास न करते और हमारे इस प्रयास के पीछे 40 साल की साधना है. यह कोई आकस्मिक जनादेश नहीं है, यह कोई चमत्कार नहीं हुआ है. हमने मेहनत की, हम लोगों में गए हैं, हमने संघर्ष किया है. यह 360 दिन चलने वाली पार्टी है, यह कोई चुनाव में खड़ी होने वाला पार्टी नहीं है और आज हमें अकारण कटघरे में खड़ा किया जा रहा है क्योंकि हम थोड़ी सी ज्यादा सीटें नहीं ले पाए. हम मानते हैं हमारी कमज़ोरी है. हमें बहुमत मिलना चाहिए था. राष्ट्रपति ने हमें अवसर दिया, हमने उसका लाभ उठाने की कोशिश कि लेकिन हमें सफलता नहीं मिली वह अलग बात है. लेकिन फिर भी हम सदन में सबसे बड़े विरोधी दल के रूप में बैठेंगे और आपको हमारा सहयोग लेकर सदन चलना पड़ेगा, यह बात समझ लीजिये. लेकिन सदन चलाने में और ठीक से चलाने में हम आपको सहयोग देंगे यह आश्वासन देते हैं. लेकिन सरकार आप कैसे बनाएंगे, वह सरकार कैसे चलेगी वह मैं नहीं जनता. आप सारा देश चलाना चाहते हैं, बहुत अच्छी बात है, हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं. हम देश की सेवा के कार्य में लगे रहेंगे. हम संख्या बल के सामने सर झुकाते हैं और आप को विश्वास दिलाते हैं  कि जो कार्य हमने अपने हाथ में लिया है वह जबतक राष्ट्रीय उद्देश्य पूरा नहीं कर लेंगे तब तक विश्राम नहीं करेंगे, आराम से नहीं बैठेंगे. अध्यक्ष महोदय, मैं अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति महोदय को देने जा रहा हूं.

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की यादों की पोटली खुलती है ग्वालियर में शिंदे की छावनी में कमलसिंह के बाग से। सीधी सच्ची कहानी एक महान कवि की, कहानी एक स्टेट्समैन की, कहानी एक पत्रकार की। भारतीय राजनीति के व्यास, विदुर और चाणक्य की।

सारा देश ही मेरा घर है, मुझे सारे देश को बनाना है।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के लिए पूरा हिंदुस्तान ही घर था मगर उनका जन्म ग्वालियर में 25 दिसंबर 1924 को हुआ। एक शिक्षक के घर में जन्मे अटल ने बचपन से लेकर जवानी के खूबसूरत लम्हे आज भी ग्वालियर की गलियों में महसूस किए जा सकते हैं। साल 1924 में ग्वालियर में शिंदे की छावनी की तंग गलियों में गिरिजाघर की घंटी ने जैसे ही बड़ा दिन यानी 25 दिसंबर शुरू होने की घंटी बजाई तब कमलसिंह के बाग में एक छोटे से घर में किलकारी सुनाई दी थी।

ये घर था पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी का, जो उत्तर प्रदेश के बटेश्वर से मध्य प्रदेश की ग्वालियर रियासत में शिक्षक की नौकरी करने आए थे। मां कृष्णा की अटल सातवीं संतान थे। तीन बहनें, तीन भाई। अटल बिहारी वाजपेयी की संजीदगी को देखकर ये अंदाजा लगाना मुश्किल है कि उनका बचपन बेहद नटखट और शरारतों से भरा हुआ था। कमल सिंह के बाग की गलियों में अटल ने खेल खेले हैं। खेलों में जो सबसे ज्यादा पसंद था, वो था कंचे खेलना। बचपन से ही कवि सम्मेलन में जाकर कविताएं सुनना और नेताओं के भाषण सुनना और जब मौका मिले मेले में जाकर मौज मस्ती करना।

अटल की वो पुरानी यादें

अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने घर में पिता की याद में लायब्रेरी बना दी थी। शहर के सैकड़ों बच्चे इसमें किताब और कंप्यूटर की तालीम ले रहे हैं। स्कूली पढ़ाई खत्म करते ही अटल बिहारी वाजपेयी में अहम मोड़ आया। क्योंकि अब ऐसे व्यक्तित्व का विकास शुरू होगा जो बड़ा कवि, नेता पत्रकार बना। जिसे भारतीय राजनीति में कभी व्यास कहा गया तो कभी विधुर तो कभी चाणक्य। लेकिन घरवालों के लिए हमेशा सरल और सहज। इतने सहज कि अटल बिहारी का नाम लेने पर ही घरवाले भावुक हो जाते हैं।

भतीजी कांति मिश्रा के मुताबिक जब वो एक दो बार सर्विस में उनके पास गईं तो कहने लगे तुम क्यों आ गई। अभी कांग्रेस सरकार तुम्हारा ट्रांसफर करा देगी। जब भी हम स्टेज पर चढ़े तो कहते थे कि तुम यहां क्यों आ गई। वो तो ड्यूटी दे रहा है, वो तो आएगा नहीं डरपोक पर तुम क्यों आ गई। अभी ट्रांसफर। होता हमेशा ट्रांसफर ही था। लेकिन उस ट्रांसफर में भी हमें आनंद था क्योंकि स्टेज पर पहुंचकर उनसे मिलना उसकी एक अलग आनंद था।

जरूरी यह है कि ऊंचाई के साथ विस्तार भी हो,   जिससे मनुष्य, ठूंठ सा खड़ा न रहे, औरों से घुले-मिले, किसी को साथ ले, किसी के संग चले।

तमाम मशरूफियत के बाद अटल अपने शौक पूरे करते रहे। बेबाकी के साथ। मसलन सिनेमा। जब मौका मिले अपनी पसंद की फिल्म थियेटर में जाकर देखते थे। अटल बिहारी वाजपेयी के शागिर्द अपने गुरू के इस बेबाक अंदाज के कायल हैं। पूर्व सांसद और मध्य प्रदेश के वरिष्ठ बीजेपी नेता कैलाश सारंग याद करते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी एक बार इंदौर अधिवेशन में आए। वाजपेयी जी और आडवाणी जी दोनों साथ थे। शाम को कार्यक्रम समाप्त हुआ। कहने लगे वहां चलना है। मैने कहा कहां। कहने लगे कौन सी अच्छी फिल्म लगी है, टिकिट मंगाओ। एक गाड़ी चुपचाप ली। सिनेमा देखने गए।

एक सवाल, अटल बिहारी वाजपेयी ने गठबंधन सरकार बखूबी चलाने का हुनर कहां से सीखा। जवाब ग्वालियर में उनके भरे पूरे परिवार में छिपा है। हर कदम कुछ सीखने की चाहत रखने वाले अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने भरे पूरे कुनबे की बदौलत ही हिंदुस्तान को कामयाब गठबंधन सरकार की सौगात दी। हिंदुस्तान में पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अलग अलग तान खींचने वाली अठारह पार्टियों की सरकार चलाई। सरकार बखूबी चली। लेकिन इसकी तालीम अटल बिहारी वाजपेयी बचपन से ही अपने घर से ली।

सिर्फ एक पीढ़ी की बात की जाए तो अटल बिहारी वाजपेयी के परिवार में चालीस लोग थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अटल सबके सुख दुख के साथी रहे। घर में कोई भी झगड़ा हो तो सुलह के लिए अटल बिहारी वाजपेयी को ही याद किया जाता था। अटल जी के भतीजे दीपक वाजपेयी बताते हैं कि चार भाई और तीन बहन और सात लोगों के बीच में अटलजी एकमात्र राजनीतिज्ञ रहे और अविवाहित रहे। छह की शिकवे शिकायत वो शुरू से दूर करते थे ये सच है। किसी के मन में कोई भी बात होती थी तो सीजफायर करने के लिए वो दिल्ली से आते थे ये बात सही है।

अटल बिहारी वाजपेयी जिंदगी से कुछ सवाल हमेशा करते रहे। उनकी एक कविता है यक्ष प्रश्न।

जो कल थे, वे आज नहीं हैं।

जो आज हैं, वे कल नहीं होंगे।

होने, न होने का क्रम, इसी तरह चलता रहेगा।

हम हैं, हम रहेंगे, यह भ्रम भी सदा पलता रहेगा।

अटल की कविता उनकी जिंदगी का जैसे आईना है। 1977-78 में अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री थे। सादगी देखिए। ग्वालियर आए तो बीजेपी के संगठन महामंत्री के साथ साइकिल से सर्राफा बाजार की सैर पर निकल गए। इसी ग्वालियर सीट से अटल बिहारी वाजपेयी 1984 के लोकसभा चुनाव में माधव राव सिंधिया से हार गए। मगर हार जीत उनके लिए ज़िंदगी का हिस्सा थीं। राजनीति की रपटीली राहों पर अटल बिहारी वाजपेयी की जिंदगी कवि की कविता की तरह सरपट भागती रही। अटल बिहारी को हिंदी पुत्र मानकर ग्वालियर के लोगों ने हिंदी माता का मंदिर बनाया है। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में दिए गए उनके भाषण को हमेशा जिंदा रखने के लिए।

हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा, काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं, गीत नया गाता हूं।

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