सेल्स और मार्केट स्पेस की रेस में पिछडऩे से ऑफलाइन कंपनियों की ब्रांड वैल्यू भी गिर रही है।

ब्रांड एक्सपर्ट प्रहलाद कक्कड़ के मुताबिक, ‘ सेल्स और मार्केट स्पेस की रेस में पिछडऩे से ऑफलाइन कंपनियों की ब्रांड वैल्यू भी गिर रही है। इसका लॉन्ग टर्म में उनपर गंभीर असर होगा। जबकि ऑनलाइन कंपनियों की ब्रांड वैल्यू बढ़ रही है। बेशक इस सेक्टर में विलय-अधिग्रहण का दौर अभी चलेगा, लेकिन जो कंपनी बच जाएगी, वे बाजी मार ले जाएगी। दूसरी तरफ उपभाक्ता वैल्यू इन्वेस्टर्स की तरह व्यवहार कर रहे हैं। चूंकि ई-रिटेलर्स उन्हें बड़ा डिस्काउंट दे रहे हैं, ऐसे में वे आगे आने वाली जरूरत की चीजें भी पहले खरीद ले रहे हैं।’

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वीडियोकॉन, एलजी और गोदरेज समेत कुछ प्रमुख ऑफलाइन रिटेलर्स ने जिस तरह से फ्लिपकार्ट, अमेजन और स्नैपडील जैसे ई-रिटेलर्स के खिलाफ आर-पार की लड़ाई छेड़ दी है, उससे अब कोई शक नहीं कि ऑफलाइन रिटेलर्स की चुनौतियां बहुत बढ़ गई हैं। कई ऑफलाइन कंपनियों ने ई-प्लेटफार्म पर उपलब्ध चीजों को नकली बताते हुए उन पर वॉरंटी देने तक से इंकार कर दिया है। उन्होंने अपने उन डिस्ट्रिब्यूटर्स को सामान उपलब्ध कराने से भी मना कर दिया है, जो ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए काम करते हैं। उनकी इस बेचैनी से साफ है कि सेल्स और मार्केट शेयर की इस रेस में ऑनलाइन रिटेलर्स जहां फ्रंट फुट पर हैं, वहीं ऑफलाइन रिटेलर्स बैक फुट पर जा चुके हैं।
तीनों प्रमुख ई-रिटेलर्स ने त्योहारी सीजन में पिछले साल की तुलना में रिकॉर्ड सेल्स ग्रोथ का दावा किया है। जबकि ऑफलाइन सेल्स में 40 फीसदी तक की कमी का अनुमान है। इनकी बेचैनी इसलिए बढ़ गई है क्योंकि सेल्स में लगातार कमी आ रही है।ऑनलाइन रिटेलर्स के पक्ष में सबसे बड़ी चीज उनकी प्राइसिंग है। वे जिस कीमत पर चीजें उपलब्ध करा रहे हैं, उस पर ऑफलाइन रिटेलर्स के लिए उपलब्ध कराना संभव नहीं है। कीमतें कम होने की सबसे बड़ी वजह मैन्युफैक्चरर्स और उनके बीच बिचौलिए का नहीं होना है। घर से चीजें बुक कराने व घर पर पाने का कम्फर्ट, लोगों के पास समय की कमी, न्यूक्लीयर फैमिली सिस्टम, रिटर्न की सुविधा भी ई-रिटेलर्स के पक्ष में हैं। जबकि ऑफलाइन रिटेलर्स की संरचना जटिल है और कपड़े, व्हाइट गुड़स समेत खपत में आ रहे बूम का वे लाभ नहीं ले पा रहे हैं।
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