एक बार फिर भारत में कोरोना पहुंचेगा पीक पर

नई दिल्ली। कोरोना वायरस ने भारत में सितंबर में ही कोरोना संक्रमण के मामलों का पीक पार कर लिया था और इसे अगले साल फरवरी तक इसे नियंत्रित किया जा सकता है। ऐसा माना जा रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि प्रदूषण के कारण सर्दियों में मौत के मामले बढ़ सकते हैं। प्रदूषण से लोगों को श्वसन संबंधी समस्याएं ज्यादा होती हैं। वह कहती हैं कि इस दौरान एंटीबॉडी सर्वे करते रहना बेहद महत्वपूर्ण है। साथ ही उन शहरों और गांवों में नजर रखनी जरूरी है, जहां संक्रमण के कम मामले आए हैं। ऐसे इलाके वायरस के फैलाव के लिए ज्यादा अनुकूल होते हैं। डॉक्टरों का यह भी कहना है कि ‘दुनियाभर में सामने आए अनुभव बताते हैं कि एक और पीक होगा लेकिन कब, ये नहीं कहा जा सकता। इसलिए महत्वपूर्ण है कि किसी जगह पर अस्पताल की क्षमता के मुकाबले संक्रमण के मामले कम रखें। मरीजों को अस्पताल में भर्ती करने की कम जरूरत पड़े। साथ ही सार्वजनिक स्वास्थ्य दिशानिर्देशों का पालन करें।’ कोरोना के मामले कम जरूर हुए हैं लेकिन जानकार कहते हैं कि खतरा टला नहीं है। इसलिए मास्क लगाएं और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें। पीक वो स्थिति है जिसके बाद मामलों की संख्या घटनी शुरू होती है। ऐसे सभी मॉडल मानकर चलते हैं कि लोग आगे भी मास्क पहनते रहेंगे, भीड़-भाड़ वाली जगहों पर नहीं जाएंगे, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करेंगे और नियमित रूप से हाथ धोएंगे।

भारत में अब तक कोरोना वायरस के 75 लाख मामले आ चुके हैं और 114610 लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि, पूरी दुनिया में वायरस से होने वाली मौतों का केवल 10 फीसदी हिस्सा भारत में है। यहां कोरोना वायरस से होने वाली मृत्यु दर दो प्रतिशत से नीचे है जो दुनिया में सबसे कम है। भारत में सितंबर मध्य तक पीक की स्थिति बन गई थी। उस समय यहां 10 लाख से ज्यादा एक्टिव मामले हो चुके थे। तब से भारत में कोरोना संक्रमण के मामले लगातार घट रहे हैं। पिछले हफ्ते तक भारत में हर दिन औसतन 62,000 मामले आए और 784 मौतें हुईं। कई राज्यों में कोविड-19 के कारण रोजाना होने वाली मौतों में भी कमी आ रही है। लगातार टेस्ट किए जा रहे हैं। पिछले हफ्ते हर दिन औसतन एक लाख से अधिक सैंपल की जांच की गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर मार्च में लॉकडाउन नहीं होता तो भारत में एक्टिव मामलों की संख्या एक करोड़ 40 लाख से ज्यादा पहुंच चुकी होती। वहीं, कोविड-19 से 26 लाख लोगों की मौत हो चुकी थी, जो मौजूदा मौत के आंकड़ों से 23 गुना ज्यादा है। दिलचस्प है कि बिहार और उत्तर प्रदेश में हुए अध्ययन में आए नतीजे कहते हैं कि इन दोनों राज्यों में बिना पर्याप्त जांच व सावधानी के लौटे प्रवासी मजदूरों का कोरोना के मामलों पर बहुत कम असर पड़ा है।

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