सिफलिस रोगी कुछ बातों का रखें खास खयाल

सिफलिस शारीरिक संबंध बनाने से फैलने वाली बीमारी है। इसकी शुरुआत ट्रेपोनेमा पल्लिडम नामक जीवाणु के कारण होती है। इससे पीड़ि‍त व्‍यक्ति का यदि समय पर उपचार और खास देखभाल न की जाए, तो यह जीवन के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है।

सिफलिस महिलाओं और पुरुषों दोनों में पाई जाने वाली बीमारी है। सिफलिस से ग्रस्‍त रोगी से शारीरिक संबंध बनाने पर यह दूसरे व्‍यक्ति को भी हो जाता है। उपचार में लापरवाही पर यह हार्ट डिजीज, नर्व डिसऑर्डर, ब्रेन डैमेज, मेंटल डिसऑर्डर और यहां तक कि अंधेपन का कारण भी बन सकता है। सिफलिस के प्रारंभिक स्‍तर में जननांग के आस-पास फुन्सियां दिखाई देती हैं। ये फुन्सियां सख्त, गोल, छोटी और दर्द रहित होती हैं।

किसी रोगी में सिफलिस के तीसरे चरण में पहुंचने पर यह खतरनाक होता है। तीसरा चरण इसका अंतिम स्‍तर है। ऐसे में रोगी या उसके पार्टनर को उपचार के साथ ही कई बातों का ख्‍याल रखना पड़ता है। इस लेख के जरिए हम आपको बता रहे हैं, सिफलिस के रोगी को किन-किन बातों का ख्‍याल रखना चाहिए।

सिफलिस की पुष्टि होने पर सबसे पहले अपने लाइफ पार्टनर को बताना चाहिए। इससे आपको मानसिक रूप से मजबूती मिलेगी। साथ ही उनसे उपचार के दौरान शारीरिक संबंध बनाने के लिए साफ मना कर दें। हो सकें तो अपने पार्टनर की भी जांच करानी चाहिए।
संभोग से रहे दूर

सिफलिस का उपचार पूरा होने तक किसी भी प्रकार की यौन क्रियाओं में शामिल नहीं होना चाहिए। इसे पूरी तरह से ठीक होने में कम से कम दो महीने का समय लगता है। शराब और नशे की गोलियों का सेवन बंद करने से भी सिफलिस के खतरे को कम किया जा सकता है।

उपचार पूरा होने और रोगी के पूरी तरह से ठीक होने के बाद शारीरिक संबंध बनाने के लिए हमेशा कंडोम का यूज करना चाहिए। साथ ही सुरक्षित सेक्‍स का भी ध्‍यान रखें। हालांकि कंडोम इससे बचाव करने में पूरी तरह कारगर नहीं है। सिफलिस के घाव कई बार ऐसे हिस्‍से में होते हैं, जिन्‍हें कंडोम से कवर नहीं किया जा सकता।

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सिफलिस से ग्रस्‍त रह चुके व्‍यक्ति के एचआईवी पॉजिटिव होने की आशंका रहती है। इसलिए जरूरी है कि सिफलिस रोगी के ठीक होने के बाद या उपचार के दौरान ही एचआईवी परीक्षण भी करा लें।

उपचार के दौरान और उपचार के बाद दोनों ही स्थितियों में समय-समय पर रोगी की जांच करानी चाहिए। जांच कराने से आप और आपका पार्टनर दोनों ही किसी भी तरह के खतरे से बचे रहेंगे। टेस्‍ट निगेटिव आने पर भी जांच को नियमित रखें।

पेनिसिलिन का इंजेक्‍शन सिफलिस के उपचार में कारगर है। यदि यह पहले या दूसरे चरण में है, तो इसका एक इंजेक्‍शन कूल्‍हे में लगाने से फायदा मिलता है। तीसरे चरण में पहुंचने पर इसकी चिकित्‍सा में समय लगता है और इंजेक्‍शन भी ज्‍यादा लगाने पड़ते हैं। रोगी के ठीक होने के बाद समय-समय पर उसकी जांच कराते रहना चाहिए।

यदि कोई महिला अपने शरीर में सिफलिस की पहचान नहीं कर पाती है, और वह गर्भवती है तो ऐसे में उसका गर्भपात हो सकता है या उसका शिशु जन्‍म के बाद मर सकता है। उपचार के अभाव में यह बीमारी पहले से दूसरे और दूसरे से तीसरे चरण में पहुंच जाती है। सिफलिस का अंतिम चरण रोगी के जीवन को तबाह भी कर सकता है।

सिफलिस की अंतिम अवस्‍था रोगी के लिए खतरनाक हो सकती है। इसलिए जरूरी है कि इसके लक्षणों के बारे में जानकारी करें और किसी भी संकेत के दिखाई देने पर चिकित्‍सक से परामर्श करें।

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