जन्मदिन विशेष: जानिए दामोदर सावरकर क्यों कहलाए ‘वीर’, पीएम ने किया याद

नई दिल्ली। देश आज स्वतंत्रता आंदोलन के सशक्त सेनानी और प्रखर राष्ट्रवाद प्रणेता वीर सावरकर की जयंती मना रहा है। वीर सावरकर की जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें याद करते हुए ट्वीट किया। उन्होंने लिखा कि वीर सावरकर की जयंती पर मैं उनको नमन करता हूं, हम उन्हें उनकी बहादुरी, स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान और हजारों लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए नमन करते हैं। इसके अलावा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी ट्वीट कर वीर सावरकर को याद किया। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी वीर सावरकर को याद करते हुए ट्वीट किया

अंग्रेजों ने वापस ले ली थी कानून की डिग्री
वीर दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र में नासिक के निकट भागुर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम दामोदर पन्त सावरकर और माता का राधाबाई था। महज 9 वर्ष की आयु में उनकी मां का हैजे से निधन हो गया। इसके सात वर्ष बाद उनके पिता का भी निधन हो गया। सावरकर का पालन पोषण उनके बड़े भाई गणेश ने किया। उन्‍होंने स्‍नातक की डिग्री हासिल की लेकिन चूंकि उन्‍होंने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़चढ़कर हिस्‍सा लिया था इसलिए अंग्रेजी हुकूमत ने इसको वापस ले लिया था। उन्‍होंने वकालत की डिग्री भी हासिल की थी। लेकिन इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादारी की शपथ लेने से मना करने पर उन्हें वकालत करने से रोक दिया गया। महात्‍मा गांधी की हत्या में सावरकर पर सहयोगी होने का आरोप लगा था। लेकिन अदालत में ये आरोप सिद्ध नहीं हो सका और वे बाइज्‍जत बरी हुए। 26 फरवरी 1966 उन्‍होंने अंतिम सांस ली थी।

इसलिए सावरकर कहलाए ‘वीर’
बात साल 1936 की है, जब कांग्रेस पार्टी में एक बयान को लेकर सावरकर का विरोध होने लगा था। पार्टी के सभी कार्यकर्ता उनके खिलाफ हो गए थे। लेकिन एक व्यक्ति ऐसा था, जो सावरकर के साथ खड़ा था। उस शख्स का नाम था- पीके अत्रे। आचार्य पीके अत्रे नौजवानी की उम्र से ही सावरकर से काफी प्रभावित थे। पीके अत्रे एक मशहूर पत्रकार, शिक्षाविद, कवि और नाटककार थे। इसके बाद पीके अत्रे ने सावरकर के स्वागत के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन किया। ये कार्यक्रम बालमोहन थिएटर के तहत आयोजित किया गया था। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इस कार्यक्रम का काफी विरोध किया। उनके खिलाफ पर्चें बांटे और काले झंडे दिखाने की धमकी दी। लेकिन फिर भी सावरकर स्वागत कार्यक्रम में शामिल होने हजारों लोग आए। इसी दौरान पीके अत्रे ने सावरकर को ‘स्वातंत्र्यवीर’ की उपाधि से संबोधित किया। बाद में सावरकर के नाम के आगे वीर जोड़ दिया गया और हमेशा के लिए यह सेनानी वीर सावरकर हो गया।

सावरकर से जुड़ा था यह विवाद

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सावरकर को लेकर अनेक विवाद हैं। उनमें एक विवाद ये है कि साल 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के छठे दिन ही उन्हें गाँधी की हत्या की साजिश में शामिल होने के आरोप में मुंबई से गिरफ़्तार किया गया था, लेकिन फ़रवरी 1949 में उन्हें बरी कर दिया गया था।

 

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