भाजपा : गरीबी के हथियार से ओडिशा फतह करने निकली, पहली बार पटनायक दिख रहे पस्त

गुजरात अगर विकास की प्रयोगशाला है और मध्य प्रदेश कृषि की तो ओडिशा अब बीजेपी के लिए गरीबी दूर करने की प्रयोगशाला बनने जा रहा है। इस नये मंत्र के साथ ही बीजेपी इस शनिवार को भुवनेश्वर में सत्ता बदलने का शंखनाद करने जा रही है। पार्टी के सभी बड़े नेता मिशन ओडिशा पर महा मंथन करने के लिए यहां एकत्र हो रहे हैं। ज़ाहिर है इस मंथन से निकला अमृत ही बीजेपी को सत्ता का स्वाद चखा सकता है।

बीजेपी के एक केन्द्रीय मंत्री ने इंडिया संवाद को बताया कि ओडिशा में कालाहांडी जैसे जिले दुनिया भर में भुखमरी के अभी तक पर्याय हैं।  सिर्फ कालाहांडी ही नही बोलांगीर और कोरापुट जैसे इलाकों में भी आज भुखमरी देश के लिए बड़े शर्म की बात है। ओडिशा में अपने कंधे पर कोई लाचार आदमी जब पत्नी की लाश मीलों दूर तक सड़कों पर ढोता हुए देखा जाता है तो यहां की बेबस तस्वीर देश की आंखों में गढ़ती है। लेकिन ऐसी दर्दनाक घटनाएं नवीन पटनायक राज में कोई नई नहीं हैं। शायद इसलिए बीजेपी  गरीबी को दूर करने के लिए अब ओडिशा में अंत्योदय को राजनीतिक मुद्दा बनाने जा रही है।

पिछले दो-तीन दिन से पूरे ओडिशा के बड़े शहरों में मोदी और कमल के  इश्तिहार और अखबारों में बड़ी बड़ी सुर्खियां जता रही है की पार्टी अब हर कीमत पर ओडिशा में सरकार बनाना चाहती है। 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ साथ यहां विधान सभा चुनाव भी होने है। बीजेपी का मुकाबला चार बार से लगातार चुनाव जीतती चली आई नवीन पटनायक की  पार्टी बीजेडी से है। पटनायक यूं तो जनता में लोकप्रिय हैं लेकिन वो ओडिशा की गरीबी से  खुली लड़ाई नही लड़ सके ।

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ओडिशा में पंचायत चुनाव जीतने के बाद जहां बीजेपी पहली बार अकेले दम पर बड़ा समर्थन जुटाने में कामयाब रही वहीं बीजेडी के भीतर मची जंग नवीन पटनायक के लिए शुभ संकेत नही है। बीजेडी में कई सांसद और विधायक अब बीजेपी की तरफ नजदीकियां बढ़ाते दिख रहे है क्यूंकि पटनायक की सत्ता के साथ साथ दल पर भी पकड़ कमज़ोर होती जा रही है।

आपपके मन में सवाल उठ सकता है कि तेज गर्मी वाले भुवनेश्वर में ही भाजपा को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक क्यों करनी पड़ रही। इसके पीछे अच्छे-भले कारण हैं। उड़ीसा में हाल के दिनों में भाजपा का ग्राफ तेजी से उठा है। पंचायत चुनाव इसका गवाह है। जिसमें भाजपा ने जहां सत्ताधारी बीजद के गढ़ में सेंध लगाई तो कांग्रेस को तीसरे नंबर पर छोड़ दिया।  भाजपा को 2012 में 851 पंचायत सीटों में  सिर्फ 36 सीटें ही नसीब हो सकीं थीं, मगर इस बार पार्टी ने 306 सीटें जीती हैं। वहीं बीजू जनता दल की सीटें 651 से घटकर 460 रह गई। पिछले साल जिस तरह से यूपी में चुनाव के नाते भाजपा ने इलाहाबाद में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक कर पूरा माहौल बनाया और नतीजा जीत में आया। उसी तर्ज पर भाजपा अब 2019 में लोकसभा के साथ उड़ीसा में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सोची-समझी रणनीति के तहत भुवनेश्वर में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक कर रही है। बढ़ता ग्राफ और पटनायक की सत्ता-संगठन पर ढीली पकड़ से भाजपा को इस बार अपने लिए यहां मुफीद मौका लग रहा है। बता दें कि पिछले विधानसभा चुनाव में 147 में से भाजपा को सिर्फ 10 सीटों पर विजय मिली थी। सूबे से एकमात्र भाजपा सांसद जुएल आरोम मोदी कैबिनेट में मंत्री भी हैं। यही वजह है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व बीजद से सत्ता छीनने को अपने लिए चुनौती भी मानता है। लिहाजा माहौल बनाने के लिए हरसंभव कोशिश की जा रही है। इसका आगाज राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से होने जा रहा है।

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