ज़री कारीगरों का दर्द – ‘मोदी जी को क्या पता… हमारा क्या हाल है?

रामपुर के घेर नज्जू खान इलाके में हमारी मुलाकात 60 साल के मज़हर मियां से होती है जो पिछले 40 साल से ज़री का काम कर रहे हैं. वो कहते हैा, ये कारोबार पहले ही काफी दबाव में है. माल महंगा होता जा रहा है और काम की कीमत नहीं मिलती लेकिन नोटबंदी के बाद तो हमारा काम ठप्प हो गया है. मज़हर उन कारीगरों में हैं जिनका माल मुरादाबाद औऱ दिल्ली और फिर देश के कई हिस्सों में जाता है. साड़ियां, दुपट्टे और सूट. ज़री के काम के नायाब हुनरमंद ये कलाकार नोटबंदी के बाद से परेशान हैं.

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आखिर इन कारीगरों को कैश क्यों चाहिये, आप इन्हें चेक से पैसा क्यों नहीं देते? इस सवाल के जवाब में मज़हर बताते हैं कि उनके कारीगरों को 50 से 60 रुपये प्रतिदिन मिलता है. यानी पूरे महीने हर रोज़ भी काम करें तो 2000 रुपये से अधिक नहीं कमाते हैं. ऐसे में लोगों को खाते खोलने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई. जितना कमाते हैं उतने से ज़िंदगी बड़ी मुश्किल से चल पा रही है.

जब उनसे पूछा गया कि क्या आप डेबिट कार्ड या मोबाइल एप इस्तेमाल नहीं कर सकते. वह कहते हैं, बिल्कुल बेकार चीज़ है हमारे लिये, हम 50-60 रुपये रोज़ कमाने वाले आदमी क्रेडिट कार्ड या किसी और कार्ड का क्या करेंगे. जिस चीज़ को हम जानते नहीं हम उसका क्या करेंगे. जब हमारा खाता ही नहीं खुला तो हम क्या करेंगे (इस सुझाव का).

मज़हर जिस जगह काम करते हैं वहां लकड़ी के वो फ्रेम सूने पड़े हैं जिस पर कारीगर काम किया करते थे. सिर्फ तीन लोग एक दुपट्टे पर काम करते दिखे. मज़हर कहते हैं, डेढ़ महीने पहले तक 30 से 35 लोग थे. आज सब काम छोड़कर जा चुके हैं क्योंकि मेरे पास उन्हें देने के लिये कैश नहीं है.

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आप जितना महीने में कमाते हैं उतने में घर नहीं चल पाता? यह सुनकर हाशिम का गला भर आता है. कहते हैं, मैं बाईस से तेइस सौ रुपये महीने कमाता हूं. हम पांच भाई हैं और दो बहनें हैं. एक घर है टूटा फूटा. अब मोदी जी को क्या पता है. उन्होंने तो अपना फैसला जो कर दिया वो तो बदल नहीं सकता. अब घर में खाने को हो या ना हो उन्हें कुछ पता नहीं है. कैसे वक्त काट रहे हैं ये हम जानते हैं हमारा दिल जानता है.

घेर नज्जू ख़ान मुहल्ले से कुछ दूर हमारी मुलाकात इसरार, समद और हारिश से हुई. तीनों ज़री का काम छोड़ चुके हैं. 35 साल के इसरार ने कहा, गांव से माल लेकर में बाज़ार में बेचता लेकिन कैश न होने से ज़बरदस्त मार पड़ी है. अब कहां जाएं नहीं मालूम. अब हाथ में हाथ रखकर बैठे हैं.

40 साल के जावेद ने काम न मिलने से रिक्शा चलाना शुरू किया लेकिन वह कहते हैं कि रामपुर में सवारी कम और रिक्शे अधिक हो गये हैं. अब तो रिक्शा चलाना भी कारगर नहीं रहा. सारे लोग काम ठप्प होने से वहीं भाग रहे हैं. रिक्शेवालों को सवारी नहीं मिल रही.

हाशिम का सेठ मज़हर आखिर क्यों अपने कारीगरों को पुराने नोट दे रहा है. वह अपनी मजबूरी जताता है क्योंकि बहुत सारे व्यापारी इन छोटे कारोबारियों को पुराने नोट ही थमा रहे हैं. वह कहते हैं, सर हमें ऊपर से यही नोट मिल रहा है. जहां से हम माल खरीद रहे हैं वह कहता है कि यही नोट लो नहीं तो कुछ नहीं मिलेगा. मजबूरी में ये सब हो रहा है.

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