हिन्दी पत्रकारिता दिवस

आज पत्रकारिता को एक आन्दोलन के जरिए परिसंचरण व पुर्नजीवन की आवश्यकता है।

भारतवर्ष आज हिन्दी पत्रकारिता दिवस मना रहा है। 194 वर्ष पूर्व आज ही के दिन राजधानी कलकत्ता में कानपुर के रहने वाले वकील पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने पत्रकारिता के इतिहास की नींव पर आधारशिला रखी। पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने आज ही के दिन 30 मई सन् 1826 को “उदन्त मार्तण्ड” का पहला साप्ताहिक संस्करण हिन्दी में मंगलवार को प्रकाशित किया था। साप्ताहिक अखबार में हिन्दी, बृज और अवधी भाषा का मिश्रण होता था। यह समाचार पत्र सन् 1827 दिसम्बर तक प्रकाशित हुआ उसके पश्चात डाक शुल्क में छूट न दिए जाने व धन के अभाव के कारण 79वां संस्करण प्रकाशित होने के बाद अखबार को बन्द कर देना पड़ा।

भारतवर्ष में पत्रकारिता का जन्म 18वीं शताब्दी में कलकत्ता, बम्बई एवं मद्रास में हो चुका था। कलकत्ता गजट पहला प्रयास था। इसके पश्चात सन् 1816 में बंगाल गजट बंगला भाषा में प्रकाशित हुआ। सन् 1826 से सन् 1873 तक हिन्दी पत्रकारिता का शैशव काल था। सन् 1873 में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने हरिश्चन्द्र मैगजीन के अन्तर्गत हरिश्चन्द्र चन्द्रिका व कवि वचन सुधा प्रकाशित की। सन् 1895 में नागरीप्रचारिणी पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ व आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा प्रकाशित सरस्वती पत्रिका भी प्रसिद्धी पर रही। इसके पश्चात ‘अभ्युदय‘ सन् 1905, ‘प्रताप‘ सन् 1913, ‘कर्मयोगी‘, ‘हिन्द केसरी‘ सन् 1908, हिन्दी राजनीतिक पत्रिका पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। दैनिक संस्करण में ‘कलकत्ता समाचार‘, ‘स्वतंत्र‘ और ‘विश्वामित्र‘ नामक पत्रिकाएं प्रकाशित हुयी। सन् 1921 में काशी से ‘आज‘, कानपुर से ‘वर्तमान‘ प्रकाशित हुआ। इनके योगदान से हिन्दी पत्रकारिता के आधुनिक युग की शुरूआत हुई।

अन्तर्राष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस 03 मई को मनाया जाता है। वर्ष 1993 में यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र के जन सूचना विभाग द्वारा इस दिवस को मनाने की घोषणा की गई थी। इसके अन्तर्गत प्रेस की स्वतंत्रता का मूल्यांकन, पे्रस की स्वतंत्रता पर बाहरी तत्वों के हमले से बचाव और प्रेस की सेवा करते हुए दिवंगत हुए पत्रकार बन्धुओं को श्रद्धासुमन देने के रूप में मनाया जाता है। विश्व स्तर पर प्रेस की स्वतंत्रता को सम्मान देने के उद्देश्य से यूनेस्को द्वारा 1997 से इसी दिवस पर ‘गिलेरमो कानो वल्र्ड प्रेस फ्रीडम अवार्ड‘ भी दिया जाता है। यह पुरस्कार पत्रकार अथवा संस्थान को प्रेस की स्वतंत्रता के लिए उल्लेखनीय व उत्कृष्ट कार्य हेतु दिया जाता है।

भारत में प्रेस की स्वतंत्रता भारतीयों को दिए गए अभिव्यक्ति की आजादी के मूल अधिकार से सुनिश्चित होती है। भारतीय संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19 के अन्र्तगत पत्रकारिता, प्रिन्ट मीडिया व इलेक्ट्रानिक मीडिया संचालित होते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपने भावों और विचारों को व्यक्त करने का एक व्यक्तिगत, सामाजिक व राजनैतिक अधिकार युक्तियुक्त निर्बंधन के साथ है। इसके अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति अपने विचारों का आदान-प्रदान प्रचार-प्रसार करने के लिए स्वतंत्र है। कुछ विशेष परिस्थितियां बाह्य या आंतरिक आपातकाल या राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है।

भारतीय प्रेस परिषद की स्थापना 4 जुलाई सन् 1966 को हुई जो प्र्रेस की स्वतंत्रता का संरक्षण करने व स्वतंत्रता को बनाये रखने, उच्चतम मानक निर्धारण हेतु और नागरिको के अधिकार व दायित्वों के प्रति उचित भावना उत्पन्न करने का दायित्व निवर्हन करता है। परिषद पे्रस के विरूद्ध प्राप्त शिकायतों पर विचार करती है। परिषद सरकार सहित किसी समाचार पत्र, समाचार एजेन्सी, सम्पादक या पत्रकार को चेतावनी या भर्त्सना या परिनिन्दा कर सकती है। परिषद के किसी निर्णय को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है। परिषद का अध्यक्ष राज्यसभा सभापति, लोकसभा के अध्यक्ष और पे्रस परिषद के सदस्यों में चुना गया होता है। परिषद के तीन सदस्य विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, बार कौंसिल आफ इंडिया, साहित्य अकादमी से तथा पांच संदस्य जिनमें दो राज्यसभा से व तीन लोकसभा से नामित होते हैंै, शेष सदस्य पत्रकार होते हैं। परिषद को वह सभी शक्तियां जैसे सम्मन आदि प्राप्त हंै जो सिविल न्यायालय को वाद विचारण में प्राप्त होती हैं।

Gyan Dairy

भारत में पत्रकारिता व मीडिया से संबंधित अधिनियम, प्रेस और पुस्तक रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1867, समाचार पत्र पंजीयन (केन्द्रीय) नियमावली 1956, प्रेस और पंजीयन अपील अधिकरण (व्यवहार एवं प्रक्रिया) आदेश 1961, वर्किंग जर्नलिस्ट एवं न्यूज पेपर अधिनियम 1955, प्रेस परिषद कानून 1978, केबल टेलीविजन नेटवर्क (नियमन) कानून 1995, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000, प्रसार भारती अधिनियम 1990, चलचित्र अधिनियम 1952, काॅपीराइट एक्ट 1952, केबल टेलीविजन नेटवर्क (नियमन) संशोधित कानून 2000 हैं।

पत्रकारिता समाज का चतुर्थ सशक्त स्तंभ है और इस स्तंभ को तीनों स्तंभों से ज्यादा मजबूत माना जाता है क्योंकि जनता की सारी समस्या पत्रकारिता या मीडिया द्वारा ही प्रचारित होती हैं। जनता द्वारा पूछे गए सभी प्रश्न इसी माध्यम से पूछे व रखे जाते हैं। लोकतंत्र के वास्तविक निर्माण में इस स्तंभ की भूमिका बड़ी महती है, परन्तु आज भारत की पत्रकारिता, मीडिया धन कुबेरों व कम्पनीयों के वर्चस्व में फंस गयी है। तमाम तरीके के संरक्षणवाद, ब्लैकमेलिंग व हितबद्ध समाचार के आरोप लगते रहते हैं जो नैतिक मूल्य, सामाजिक सरोकार, संवेदनशीलता व मौलिक चिंतन पर गहरा आघात है। खबरों की सच्चाईयां विज्ञापन के मायाजाल में फंसकर रह गई हैं। आज पत्रकारिता को एक आन्दोलन के जरिए परिसंचरण व पुर्नजीवन की आवश्यकता है।

जय भारत,

जय हिन्द

Share