CSO के ताज़ा जीडीपी आंकड़ों से अब क्या है अर्थशास्त्रियों की ना- इत्तेफ़ाक़ी !

जिस नोटबंदी को प्राधनमंत्री नरेन्द्र मोदी यूपी चुनाव के पांच चरणों तक छुपाते रहे वह अचानक उनका चुनावी हथियार बन गया। इसका कारण ये हैं कि सेंट्रल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस (CSO) के डेटा के मुताबिक, दिसंबर 2016 क्वॉर्टर में जीडीपी ग्रोथ 7 प्रतिशत रही है जो इस फिस्कल के दूसरी तिमाही में 7.4 प्रतिशत और पहली तिमाही में 7.2 प्रतिशत थी।

अकटूबर से दिसंबर की तिमाही के जीडीपी आंकड़ों में नोटबंदी का असर न दिखने से कई अर्थशास्त्री अचंभित भी दिखाई दे रहे हैं। उनका कहना है कि ये आंकड़े असल स्थिति से मेल नही कहते हैं। ऐसा कहने वालों में एसबीआई, आईडीबीआई बैंक के अलावा बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच के अर्थशास्त्री भी शामिल हैं।

सरकार ने नोटबंदी के बावजूद मौजूदा वित्त वर्ष के लिए उम्मीद से ज्यादा 7.1 प्रतिशत की ग्रोथ हासिल होने का अनुमान दिया है। दरअसल, कृषि क्षेत्र की विकास दर अप्रत्याशित रूप से ज्यादा रहने से भारत दुनिया में सबसे तेज रफ्तार से बढ़ रही इकॉनमी बनी हुई है।

एसबीआई के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्यकांति घोष ने कहा है कि सरकार द्वारा जारी तीसरी तिमाही के अनुमान बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि नोटबंदी के दो महीनों के दौरान अर्थव्यवस्था पर पड़ा असर इनमें दिखना चाहिए था। उनकी राय में पिछले वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही की वृद्धि के आंकड़ों को संशोधित कर बहुत अधिक कम किए जाने से चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही के आंकड़े बेहतर दिखने लगे हैं।

Gyan Dairy

फॉरन ब्रोकरेज बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच का कहना है कि 500 और 1000 रुपये के करेंसी नोट बंद करने के सरकार के फैसले से जीडीपी ग्रोथ में 1 प्रतिशत की गिरावट आई है। इस ब्रोकरेज फर्म के मुताबिक, दिसंबर तिमाही में जीवीए आधारित ग्रोथ भले ही 6 प्रतिशत के अनुमान से ज्यादा 6.6 प्रतिशत रही है, लेकिन यह डीमॉनेटाइजेशन से पहले दूसरी छमाही के वास्ते दिए गए 7.5-8 प्रतिशत के हमारे अनुमान से कम है। डीमॉनेटाइजेशन के चलते जीडीपी ग्रोथ में 1 प्रतिशत की कमी हुई है।

घोष ने एक रिपोर्ट में लिखा है, वित्त वर्ष 2016 की पहली और दूसरी तिमाही में संशोधित आंकड़ों के बेहतर होने के बवजूद वित्त वर्ष 2017 की पहली तिमाही एवं दूसरी तिमाही के आंकड़ों में सकारात्मक संशोधन इस बात का संकेत है कि मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही में आर्थिक गतिविधि में सुधार है।

नोमूरा ने आज प्रकाशित एक रिपोर्ट में सवाल उठाया है कि क्या भारत के वृद्धि आंकड़े तथ्य हैं या कपोल कल्पना? उसने कहा, आधिकारिक आंकड़ों में वास्तविकता को कमतर आंका गया है क्योंकि वे मुख्य रूप से संगठित क्षेत्र के आंकड़ों पर निर्भर है।

Share