भारत अकेले पाकिस्तान में बदलाव नहीं ला सकता दुनिया के अन्य देशों के साथ के बिना

यहां एक पैनल चर्चा में अन्य विशेषज्ञों ने भारत से अपील की कि वह ऐसी नीतियों के साथ आगे आएं जिनसे पाकिस्तान संबंधी चिंताओं से निपटा जा सके. इसके जवाब में अपर्णा ने तर्क दिया कि भारत द्वारा नीतियां बनाए जाने के बावजूद, पाकिस्तान ने अपने पक्ष में भुनाने के लिए नई दिल्ली को लेकर जो काल्पनिक हौव्वा खड़ा कर रखा है, वह खत्म नहीं होगा. अपर्णा ने कहा, “अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाए रखने के लिए पाकिस्तान के लिए जरूरी है कि वह भारत को डराए- धमकाए और फिर भारत से डरे. इसके कारण सामान्य नीतियों पर प्रतिक्रिया निष्प्रभावी हो जाती है.” उन्होंने कहा कि सेना के संस्थागत हितों के लिए यह आवश्यक है कि पाकिस्तान आतंकवाद एवं परमाणु हथियारों के जरिए अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करता रहे

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अकेला भारत पाकिस्तान के बर्ताव में बदलाव नहीं ला सकता. पाकिस्तान की स्वयं को दुनिया के लिए अपरिहार्य समझने की प्रवृत्ति है: वह समझता है कि वह इतना महत्वपूर्ण है कि उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.” उन्होंने कहा, “इसलिए जब तक शेष दुनिया भारत के साथ मिलकर काम नहीं करती, पाकिस्तान भारत के साथ खेल खेलना जारी रखेगा. वह इस संभावना के भरोसे यह काम करता रहेगा कि उसके इन खेलों में अन्य उसके पीछे खड़े रहेंगे.”अपर्णा ने ‘कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशल पीस’ के जॉर्ज पेरकोविच और टॉबी डाल्टन की पुस्तक ‘नॉट वार, नाट पीस: मोटिवेटिंग पाकिस्तान टू प्रिवेंट क्रॉस बार्ड टेरेरिज्म’ के विमोचन के अवसर पर आयोजित पैनल चर्चा में अपने विचार रखे उन्होंने कहा, “दुनिया को इस बात के लिए फुसलाते रहना होगा कि वह पाकिस्तान के बर्ताव में बदलाव के बिना, पाकिस्तान की शर्तों पर पाकिस्तान के साथ संबंध बनाए रखे. तोड़ने के लिए ही वादे करने होंगे क्योंकि कोई इसके बारे में कुछ नहीं कर सकता इस अवसर पर दक्षिण एशिया के लिए पूर्व सहायक विदेश मंत्री रॉबिन राफेल ने भी अपने विचार रखे. अपर्णा ने कहा कि “युद्ध नहीं, शांति नहीं” के रवैये से पाकिस्तान के सुरक्षा प्रतिष्ठान को लाभ होता है. उन्होंने कहा कि क्योंकि युद्ध नहीं है, इसलिए पाकिस्तानी सेना को लड़ने की आवश्यकता नहीं है लेकिन ‘शांति नहीं’ होने से संघर्ष की स्थायी स्थिति के कारण सेना का खास स्थान बरकरार रहता है.

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