भारत का आखिरी गांव, यहां के लोग सोने के लिए दूसरे देश जाते हैं

नई दिल्ली। भारत की विविधता ही उसकी पहचान है। ऐसा ही एक अनोखा गांव है, जिसके नागरिक खाना तो भारत में खाते हैं, लेकिन सोने के लिए म्यांमार चले जाते हैं। दरअसल, सीमा पर बसे कोयांक आदिवासियों का यह गांव आधा भारत में है और आधा म्यामांर की सीमा में आता है। सदियों से कोयांक आदिवासियों में दुश्मन का सिर काटने की प्रथा चल रही थी, जिस पर 1940 में प्रतिबंध लगाया गया।

लोंगवा घने जंगलों के बीच म्यांमार सीमा से लगता भारत का आखिरी गांव है। भारत के इस पूर्वोत्तर राज्य में 16 जनजातियां रहती हैं। कोंयाक आदिवासियों को बेहद खूंखार माना जाता है। अपने कबीले की सत्ता और जमीन पर कब्जे के लिए वे अक्सर पड़ोस के गांवों से लड़ाईयां किया करते थे।

इस कबीले को दो हिस्सों में कैसे बांटा जाए, इस सवाल का जवाब नहीं सूझने पर अधिकारियों ने तय किया कि सीमा रेखा गांव के बीचों-बीच से जाएगी, लेकिन कोंयाक पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। बॉर्डर के पिलर पर एक तरफ बर्मीज़ में और दूसरी तरफ हिंदी में संदेश लिखा गया है।

कोंयाक आदिवासी सबसे खूंखार आदिवासियों में से एक माने जाते हैं। 1940 से पहले अपने कबीले और उसकी जमीन पर कब्जे के लिए वे अन्य लोगों के सिर काट देते थे। कोयांक आदिवासियों को हेड हंटर्स भी कहा जाता है। इन आदिवासियों के ज्यादातर गांव पहाड़ी की चोटी पर होते थे, ताकि वे दुश्मनों पर नजर रख सकें।

हत्या या दुश्मन का सिर धड़ से अलग करने को यादगार घटना माना जाता था और इस कामयाबी का जश्न चेहरे पर टैटू बनाकर मनाया जाता था। 1940 में हेड हंटिंग पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया। हालांकि, इसके बाद भी यह घटना जारी रही। माना जाता है कि 1969 के बाद हेड हंटिंग की घटना इन आदिवासियों के गांव में नहीं हुई।

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लोंगवा गांव में कोयांक आदिवासी रहते हैं। इन आदिवासियों में मुखिया प्रथा चलती है। यह मुखिया चार से पांच गांवों का मुखिया होता है। यह मुखिया एक से ज्यादा पत्नी रखता है फिलहाल तो इस मुखिया के 60 बीवीयां हैं। भारत और म्यांमार की सीमा इस गांव के मुखिया के घर के बीच से होकर निकलती है। इसलिए कहा जाता है कि यहां का मुखिया खाना भारत में खाता है और सोता म्यांमार में है। पहले ये आदिवासी प्रकृति के तत्वों की पूजा करते थे, लेकिन अब यहां ज्यादातर लोगों ने इसाई धर्म अपना लिया है।

कोंयाक झोपड़ियां मुख्य रूप से बांस की बनी होती हैं। ये काफी विशाल होती हैं और इनमें कई हिस्से होते हैं, जैसे रसोई, खाना खाने, सोने और भंडारण के लिए अलग-अलग स्थान। आधुनिक सभ्यता से हालांकि लोंगवा अब भी काफी दूर है, लकड़ी के घर और छप्पर एक खूबसूरत संग्रह हैं, लेकिन कहीं-कहीं टिन की छतों और कंक्रीट का निर्माण बदलाव की कहानी का संकेत दे रहे हैं।

दोनों देशों की है नागरिकता

लोंगवा गांव के लोगों के पास भारत की भी नागरिकता है और म्यांमार की भी। इसको लेकर चौंकाने वाली बात यह है कि गांव के मुखिया का एक बेटा म्यांमार की सेना में सैनिक हैं। अच्छी बात जो इस गांव से जुडी हुई है वह यह कि यहां दो देशों के बीच होने के बाद भी किसी तरह का वाद-विवाद नहीं होता है।

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