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लोकल – वोकल

जो विज्ञान स्वदेशी होने पर हमारा दास होता है, वह विदेशी होने के कारण हमारा प्रभु बन बैठता है। अब समय आ गया है कि देश से ईस्ट इण्डिया कम्पनियों की वापसी का समय तय हो।

प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्र के नाम सम्बोधन में कहा है कि, ’’विश्व की आज की स्थिति हमें सिखाती है जिसका एक ही मार्ग – आत्मनिर्भर भारत है। भारत की आत्मनिर्भरता में संसार के सुख, सहयोग, शान्ति निर्भरता हैं क्योंकि भारत की आत्मनिर्भरता की आत्मा वसुधैव कुटुंम्बकम् है और आत्मनिर्भरता के लिये लोकल, वोकल के आधार पर ग्लोबल का संदेश दिया है।’’

महावीर प्रसाद द्विवेदी की इसी स्वदेशी को लेकर सन् 1903 में सरस्वती पत्रिका में छपी दो पंक्तियां –

’हजारों लोग भूखों मर रहे हैं, पड़े वे आज या कल कर रहे हैं।

इधर तू मंजु मलमल ढूंढता है, न इससे और बढ़कर मूढ़ता है।।’

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने सन् 1872 में बंग-भंग आन्दोलन के संदर्भ में कहा था कि, ’’जो विज्ञान स्वदेशी होने पर हमारा दास होता है, वह विदेशी होने के कारण हमारा प्रभु बन बैठता है।’’ इसके बाद भोला चन्द्र ने सन् 1874 में मुखर्जीज़ मैग्ज़ीन में स्वदेशी का नारा दिया, ’’यह संकल्प करें कि विदेशी वस्तु नहीं खरीदेंगे। हमें हर समय यह स्मरण रखना चाहिए की भारत की उन्नति भारतीयों के द्वारा भी सम्भव है।’’

स्वदेशी का विचार व नारा कांग्रेस के जन्म से बहुत पहले ही दे दिया गया था। विदेशी वस्तु बहिष्कार के साथ-साथ इसी समय काल में ’वन्दे मातरम्’ उस युग का मूल मंत्र बना। और बंग-भंग आन्दोलन के तहत सन् 1911 में बंगाल विभाजन अंग्रेजों द्वारा रद्द कर दिया गया परन्तु इस आन्दोलन ने स्वतंत्रता आन्दोलन की नींव डाल दी।

महाराष्ट्र में गणपति उत्सव पर जब सन् 1893 में अंग्रेजों ने प्रतिबन्ध लगा दिया था तो लोकमान्य तिलक ने सन् 1893 में गणपति उत्सव को सार्वजनिक रूप से एक त्यौहार के रूप में पुणे के एक गांव में मनाया और गांव-गांव जाकर मण्डल बनाया जिससे लोग संगठित हुए और भारत की आजादी हेतु स्वदेशी और स्वराज्य को प्रेरित हुए। सन् 1905 में स्वदेशी नारा देते हुए लोगों को विदेशी चीनी खाने से मना किया क्योंकि उस समय चीनी भारत में नहीं बना करती थी, इंग्लैण्ड से आती थी। भारत में गुड़ बनता था। लाखों भारतवासियों ने चीनी छोड़ गुड़ खाना शुरू कर दिया।

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अरविन्द घोष ने उल्लेख किया है कि स्वराज्य का पहली बार उल्लेख सखाराम गणेश देउस्कर ने किया है। देउस्कर ने ही भारत की दुर्दशा के सम्बन्ध में सन् 1904 में देशेर कथा (देश की बात) पुस्तक लिखी जिसमें ब्रिटिश साम्राज्य में गुलामी की जंजीरों से जकड़ी भारतीय जनता के शोषण को उजागर किया जिसमें भारतीय अर्थव्यवस्था, कृषि व्यवस्था, उद्योग धन्धों के तहस-नहस का मार्मिक उल्लेख है जिस पर अंग्रेजों द्वारा सन् 1910 में प्रतिबन्ध लगा दिया गया था।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी का भारत में आने का एकमात्र उद्देश्य यहां पर व्यापार करना नहीं था बल्कि इसी व्यापार की आड़ में भारत पर शासन किया जाना मुख्य उद्देश्य था और इसी उद्देश्य को उसने फलीभूत भी किया। पाश्चात्य अर्थशास्त्र के जनक एडम स्मिथ ने सन् 1776 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ’वेल्थ ऑफ़ नेशन’ में कहा है कि प्रत्येक देश के अर्थशास्त्र का उद्देश्य उस देश की सम्पत्ति और शक्ति को बढ़ाना है और इसी उद्देश्य पर चलकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत पर शासन करती रही और भारत की अपार सम्पत्ति और धन इंग्लैण्ड भेजती रही।

ग्रान्ड ओल्ड मैन ऑफ़ इण्डिया दादा भाई नौरोजी इसी धन की निकासी को भारतवासियों के संज्ञान में लाये। दादा भाई नौरोजी सन् 1892 में जो लिबरल के रूप में हाऊस ऑफ़ कामंस में ब्रिटिश सांसद थे, जिन्होंने पहली बार भारत से इंग्लैण्ड जाने वाले अपार धन के बारे में बताते हुए ’ड्रेन ऑफ़ वेल्थ थ्योरी’ (धन की निकासी का सिद्धान्त) सिद्धान्त पेश करते हुए ब्रिटिश संसद के पटल पर रखा और इसके दुष्परिणामों से भारतवासियों को आगाह किया कि किस प्रकार ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत के धन को इंग्लैण्ड ले जा रही है। इसे दादा भाई नौरोजी ने भारत से लूटे गये धन की संज्ञा दी।

स्वतंत्रता पश्चात् ईस्ट इण्डिया कम्पनी से निजात तो मिली पर विश्व के समृद्ध देशों ने अपनी समृद्धता को बनाये रखने के लिये एक समूह संयुक्त राष्ट्र संघ (यू0एन0ओ0) के अन्तर्गत विश्व व्यापार संगठन (डब्लू0टी0ओ0) का गठन किया और खुली अर्थव्यवस्था का नया सूत्र वाक्य लाया गया और देशों के राजनायिकों को प्रलोभित किया गया कि अपनी देश की सीमाएं विदेशी कम्पनियों के लिये खोल दें जिससे अर्थव्यवस्था और सुदृढ़ होगी। यह ईस्ट इण्डिया कम्पनी की वापसी का दूसरा स्वरूप था जिसको विश्व स्तर पर विश्व व्यापार संगठन की आड़ में वैधानिक जामा पहनाया गया था। और इसी प्रलोभन के अन्तर्गत राजनयिकों द्वारा देश की सीमाएं पुनः खुली अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये खोल दी गयी जिसके कारण आज देश की अर्थव्यवस्था की क्या दुर्दशा है, यह सर्वविदित है।

कलाशिल्प महाकवि कालिदास ने अपने काव्य ’ऋतुसंहार’ में उल्लेख किया है, ’’ग्रीष्म, प्रावृद (वर्षा), शरद, हेमन्त व शिशिर ऋतु में प्रकृति जगत में होने वाले परिवर्तन व प्रतिक्रियाओं का मनुष्य, पशु-पक्षी तथा नानाविध वृक्षों, लताओं, फूलों के जीवन पर प्रभाव पड़ता है।’’ कलाशिल्प महाकवि कालिदास ऋतुओं के वर्णन के जरिए जीवन पर पड़ने वाले प्रभावोें को भी प्रेम स्वरूप शैली में निरूपण किया है। समय चक्र है, चलता रहता है, ऋतुएं और परिस्थितियां बदलती रहती हैं और उन्हीं ऋतुओं के अन्तर्गत मनुष्य अपनी जीवन शैली को भी बदलता है। समय बदला है, विपत्ति आई है। प्रत्येक प्राकृतिक त्रासदी को अवसर में बदलना ही मनुष्य की बुद्धिमानी का द्योतक है। अब समय आ गया है कि देश से ईस्ट इण्डिया कम्पनियों की वापसी का समय तय हो।

सोर्स-     https://prahladtandon.wordpress.com/2020/05/14/local-vocal/?fbclid=IwAR2oZLeweRP0LtRCDciJ2ATB9Ki15yeHKnW6atcKkOyzoXJWw9ZIHF4hhtU

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