कभी बेचते थे लॉटरी का टिकटऔरआज कमिश्नर बनकर मार रहे हैं देश के लुटेरों के घर छापे

कभी वह शख्स बचपन में डिस्लेक्सिया जैसी बीमारी से पीड़ित था, पढ़ने-लिखनें में दिक्कत होती थी। शब्दों को दिमाग ठीक से पहचान नहीं पाता था। शिक्षक भी परेशान हो जाते थे। एक दिन उसे स्कूल से निकाल दिया जाता है। एक तो गरीबी दूजे ऐसी बीमारी से जूझना। फिर भी बच्चे ने हार नहीं मानी। घर पर ही  पढ़ाई शुरू की।  प्राइवेट दाखिला लिया। पैसे का अभाव हुआ तो खर्च निकालने के लिए लॉटरी के टिकट बेचने  के साथ  टीवी-रेडियो की दुकान पर काम भी करना पड़ा।

वी नंदकुमार जब छठीं क्लास में थे। तब एक दिन स्कूल के प्रिंसिपल ने कहा-तुम कल से स्कूल मत आना। क्योंकि तुम ठीक से पढ़-लिख नहीं सकते। तुम्हें डिस्लेक्सिया की बीमारी है। दरअसल डिस्लेक्सिया पढ़ने लिखने से जुड़ी एक एक ख़ास समस्या है जिसका असर पढ़ने और भाषा को समझने पर पड़ता है। डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चों को पढ़ने, लिखने, स्पेलिंग लिखने या बोलने में कठिनाई होती है। ये कुछ कौशलों और योग्यताओं को प्रभावित कर सकती है।   क्योंकि उनकी समझ प्रभावित होती है। हालांकि इस बीमारी का बौद्धिकता से कोई लेना-देना नहीं होता है। यानी इंटेलीजेंट बच्चा भी डिस्लेक्सिया समस्या से जूझ सकता है।

बहरहाल उस युवा की आगे बढ़ने की ललक और जिद रंग लाई। स्कूल ड्राप-आउट से वह बच्चा आज देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा में हैं। जी हां बात कर रहे हैं 2004 बैच के आईआरएस अफसर वी नंदकुमार की। जिनकी जिंदगी का सफर बहुत रोचक मगर कठिन रहा है। आज वी नंदकुमार बतौर ज्वाइंट कमिश्नर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के इनवेस्टीगेशन विंग की कमान संभालकर आयकर चोरों के ठिकानों पर छापेमारी करते हैं।

नंद कुमार कहते हैं कि मैं औसत छात्र था। अंग्रेजी का ज्ञान बहुत कमजोर था। मगर मैने कठिन परिश्रम किया। नतीजा रंग लाया। मैं सम्मान सहित अंग्रेजी विषय में पास होने वाला पहला छात्र रहा।  वर्ष 1997 से नंद कुमार ने यूपीएससी परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी।  आखिरकार कड़ी मेहनत रंग लाई और संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सर्विसेज परीक्षा में सफलता मिली। जिसके बाद रैंक के आधार पर उन्हें भारतीय राजस्व सेवा में जाने का मौका मिला।

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नंद कुमार कहते हैं कि स्कूल से निकल जाने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। स्कूल ड्रापआउट होने के बाद प्राइवेट पढ़ाई शुरू कर दी।  उन्होंने अपनी कमजोरी को ही ताकत बनाने की सोच ली। धीरे-धीरे कड़ी मेहनत और प्रैक्टिस से   खुद को डिस्लेक्सिया जैसी बीमारी के चंगुल से बाहर करने में सफल हुए। इस बीच 52 प्रतिशत अंकों से इंटरमीडिएट परीक्षा पास की। शिव कुमार के मुताबिक इंटरमीडिएट पास करने के बाद भी उन्होंने तमाम स्कूलों के दरवाजे खटखटाए, मगर किसी ने दाखिला नहीं दिया। थकहारकर उन्होंने डॉ. अंबेडकर आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज में इंग्लिश लिटरेचर कोर्स में दाखिला लेना पड़ा।

चेन्नई में इन दिनों बतौर ज्वाइंट कमिश्नर तैनात वी नंद कुमार स्कूल-कॉलेजों के फंक्शन में अक्सर जाते रहते हैं। जहां उन्हें मोटीवेशनल स्पीकर के तौर पर बुलाया जाता है। कार्यक्रमों में नंदकुमार अपनी आपबीती सुनाकर छात्रों को हर मुसीबत से लड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। यही नहीं वे प्रतियोगी छात्रों को आईएएस-आईपीएस बनने के टिप्स भी देते हैं।

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