और बढ़ेंगे ‘बहनजी’ के बुरे दिन, कई घोटालों के राज खोल सकते हैं : नसीमुद्दीन

लगता है कि बसपा सुप्रीमो मायावती और उनकी पार्टी के अब और अधिक बुरे दिन आने वाले हैं। नसीमुद्दीन सिद्दीकी उनके खिलाफ टिकट वितरण से लेकर चीनी मिल घोटाला, स्मारक घोटाला और ताज कारीडोर घोटाला आदि के राज खोल सकते हैं। शायद, इसीलिये अब उन्हें अपनी हत्या करा दिये जाने की आहट मिल रही है। हाल ही में इन्होंने मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर अपने लिये पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था की मांग की थी।

चीनी मिलों के बिक्री में हुए घोटाले की जांच शुरू होने के बाद मायावती ने खुद के बचाव के लिये नसीमुद्दीन का नाम यह कहकर आगे किया कि इसके लिये नसीमुद्दीन को ही जिम्मेदार ठहरा चुकी हैं। उनका कहना है कि गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग विभाग नसीमुद्दीन सिद्दीकी के पास था। इससे नसीमुद्दीन की मुश्किलें बढ सकती हैं। पूर्व लोकायुक्त एन.के. मेहरोत्रा ने इन्हें स्मारक घोटाला और आय से अधिक संपत्ति के आरोपों में दोषी ठहराया था। इनके खिलाफ विजिलेंस की जांच चल रही है।

दूसरी ओर, पार्टी के तमाम कद्दावर नेताओं के अलग होने का सिलसिला लगातार जारी है। इन्हीं मायावती के चलते ही नसीमुद्दीन सिद्दीकी के पहले बसपा के दिग्गज नेता रहे राजबहादुर, बाबूसिंह कुशवाहा, स्वामी प्रसाद मौर्य, आर.के.चैधरी, जंगबहादुर सिंह पटेल, डा0 मसूद अहमद, सुधीर गोयल, सोने लाल पटेल, बरखूराम वर्मा, दीनानाथ भाष्कर, रामलखन पासी तथा कमलाकांत गौतम जैसे दूसरे अनेक प्रभावशाली नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है। जल्दी ही दूसरे और कई असरदार बसपाइयों के भी मायावती का साथ छोडने की संभावना है। मायावती ने बसपा में अपने भाई आनंद कुमार को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया तो दिया, लेकिन, नसीमुद्दीन के आगे वह अपना सिक्का नहीं जमा पा रहे थे।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, किसी बसपाई नेता के तेजतर्रार या उससे जरा सा भी मतभेद होने पर मायावती उसे कभी नहीं बर्दाश्त कर सकी हैं। कांशीराम के रहते तो इनकी मनमानी खूब चली, लेकिन, अब बसपाई ही इनके सामने सीना तानकर खडे हो रहे हैं। इसकी सबसे खास वजह यह है कि कांशीराम ने एक-एक ईंट चुनकर बसपा की सियासी इमारत को खडा किया था। मायावती उसी इमारत की एक एक ईंट को निकाल कर बाहर फेंक रही हैं। उन्हें बसपा को खडा करने की कीमत और उसका दर्द नहीं मालूम। इसे सिर्फ कांशीराम ही जानते थे। मायावती तो उनकी बनाई सियासी पूंजी का सिर्फ उपभोग कर रही हैं। यही है कांशीराम और इनके बीच का बुनियादी फर्क। इसीलिये अधिकांश दलित अब इन्हें दिल से अपना नेता नहीं मानते है। मायावती की अब न कोई हनक बची है और न उनका कोई सियासी इकबाल ही है। वह तेजी से चुकती जा रही हैं।

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हांलाकि, पूर्व मंत्री अब्दुल मन्नान और पूर्व एमएलसी अब्दुल हन्नान सहित 22 नेता सपा छोडकर फिर मायावती की शरण में आ गये हैं। लेकिन, मायावती की सियासी सुरक्षा के लिये यह किस हद तक उनके कवच बन सकते हैं, यह कहना मुश्किल है। दूसरी ओर, नसीमुद्दीन बसपा सुप्रीमो की सियासी जडों में मट्ठा डालना चाह रहे हैं। इसके लिये इनके आवास पर हुई बैठक में मौजूद पचास से अधिक पूर्व मंत्रियों और पूर्व विधायकों ने सियासी मोर्चा का नाम रखने और उसे एक नया रूप देने की जिम्मेदारी नसीमुद्दीन पर छोड दी है।

बहरहाल, कांशीराम के बसपा में सिर्फ स्वामी प्रसाद मौर्य ही ऐसे रहे हैं, जिन्होंने मायावती को खूब खरीखोटी सुनाने के बाद बसपा से नाता तोडा है। जुगुल किशोर के बसपा से इस्तीफा के बाद अभी और कई नेताओं को पार्टी से निकाला जा सकता है। इसके अलावा, पार्टी के लगातार गिरते जा रहे ग्राफ को देखते हुए भी कई बसपाई नेता खुद भी मायावती से नाता तोड सकते हैं।

इस संबंध में नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने  यह आरोप लगाया कि बाबा साहेब अंबेदकर और कांशीराम के जिस मिशन में हमने 34 साल लगाये हैं, उसे सतीश चंद्र मिश्र बर्बाद कर रहे हैं। उन्होंने ब्लैकमेलिंग कर, जेल जाने का डर दिखाकर और विरोधियों के साथ मिलकर बसपा की उसके खात्मे की कगार पर पहंुचा दिया है। बसपा में आंतरिक लोकतंत्र का घनघोर अभाव है। पूर्व मत्री स्वामी प्रसाद मौर्य का भी आरोप है कि बसपा के निरंतर हो रहे राजनीतिक पतन का कारण मायावती की धनलिप्सा है। बसपा लुटेरों का गिरोह है।  इसके मुखिया नसीमुद्दीन सिद्दीकी रहे हैं। मायावती को सबसे अधिक पैया यही देते रहे हैं। मायावती पार्टी के जोनल कोआर्डिनेटरों से पैसा वसूलती रही है।

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