अंडरवर्ल्ड से बचने के लिए रामानंद सागर ने बनाई रामायण, बेटे की जुबानी, पिता की कहानी

नई दिल्ली। अपने प्रसारण के ​33 साल बाद एक बार फिर लॉकडाउन के दौरान रामायण का दूरदर्शन पर पुन: प्रसारण हो रहा है। 25 जनवरी, 1987 को रामायण का पहला एपिसोड प्रसारित हुआ था। इस धारावाहिक ने टीवी इंडस्ट्री के इतिहास में लोकप्रियता के जो कीर्तिमान स्थापित किए थे, आज वह उन्हें फिर से दोहरा रहा है। ‘रामायण’ देखने के लिए परिवार तो क्या पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो जाता था। ‘राम-सीता’ के किरदार स्क्रीन पर आते ही लोग श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़ लेते थे।

रामानंद सागर के टीवी इंडस्ट्री में आने को लेकर कई बातें कही गईं लेकिन उनके बेटे प्रेम सागर ने बायोग्रफी में जो बातें कहीं, वो कुछ अलग थीं। प्रेम सागर लिखते हैं कि दुबई के माफियाओं की फिल्म इंडस्ट्री में दखलअंदाजी बढ़ती जा रही थी। फिरोज़ खान की फिल्म ‘कुर्बानी’ के ओवरसीज राइट्स का निपटारा माफिया ने ही करवाया था। न सिर्फ पापाजी बल्कि कई और दिग्गज फिल्म मेकर्स का मानना था कि बॉलीवुड का भविष्य अंधकार में है क्योंकि दुबई में बैठे आका लगातार फिल्म बिजनेस को अपने कंट्रोल में करते जा रहे थे।

रामानंद सागर ने ‘रामायण’ का निर्देशन किया था। उन्हीं की प्रोडक्शन कंपनी ‘सागर आर्ट्स’ ने ‘रामायण’ का निर्माण किया था। प्रेम सागर रामानंद सागर के बेटे हैं। उन्होंने रामानंद सागर की बायोग्राफी ‘एन एपिक लाइफ : रामानंद सागर’ लिखी है। प्रेम सागर ने इस बायोग्राफी में टीवी- फिल्म इंडस्ट्री और रामायण की मेकिंग से जुड़ी कई इंट्रेस्टिंग बातें बताई और कई राज़ खोले हैं। प्रेम सागर की किताब के अंश एक वेबसाइट ने प्रकाशित किए हैं। आज हम आपको ‘रामायण’ से जुड़ी वो बातें जो आपको पता नहीं होंगी।

ऐसे फिल्म की दुनिया से किया टीवी का रुख

प्रेम सागर लिखते हैं कि यह बात 1976 की है। रामानंद अपने चार बेटों (सुभाष, मोती, प्रेम और आनंद) के साथ स्विट्जरलैंड में ‘चरस’ फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। शाम को काम निपटाकर रामानंद सागर बेटों के साथ एक कैफे में जा बैठे। उस कैफे में एक टीवी था, जिसकी स्क्रीन पर कलर फिल्म चल रही थी। रामानंद और उनके बेटे हैरान थे। क्योंकि वो रंगीन टीवी थी। इससे पहले उन्होंने कभी रंगीन टीवी पर फिल्म नहीं देखी थी। तभी रामानंद सागर के मन में टीवी की तरफ मुड़ने का ख्याल आया। वहीं पर उन्होंने बेटों से कहा कि
मैं सिनेमा छोड़ रहा हूं… मैं टेलीविजन (इंडस्ट्री) में आ रहा हूं। मेरी जिंदगी का लक्ष्य मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और सोलह गुणों वाले श्री कृष्ण और आखिर में मां दुर्गा की कहानी लोगों के सामने लाना है। जब रामानंद सागर ने ‘रामायण’ बनाने का ऐलान किया, तो ज्यादातर लोगों ने उनके इस फैसले की आलोचना की।

और नहीं मिला रामायण का फाइनेंसर

रामानंद सागर ने ‘रामायण’ और श्री कृष्णा के पैम्पलेट छपवाए और घोषणा कर दी कि उन्हें वीडियो कैसेट्स के जरिए लॉन्च किया जाएगा। उनके बेटे प्रेम ने बायोग्राफी में ‘रामायण’ की तैयारी का एक किस्सा बताया है कि कैसे उनके दोस्तों ने भी इस प्रोजेक्ट के बारे में जानकर अपने हाथ खींच लिए। प्रेम सागर लिखते हैं कि पापा ने मेरे दुनियाभर की टिकट खरीदी। विदेशों में बसे उनके अमीर इंडियन फ्रेंड्स की कॉन्टेक्ट लिस्ट पकड़ाई और अपने ड्रीम प्रोजेक्ट के लिए पैसा इकट्ठा करने के लिए बिजनेस ट्रिप पर भेज दिया। उनके दोस्तों में से कई लोग इस प्रोजेक्ट को लेकर श्योर नहीं थे। कुछ ने अपने सेक्रेटरी को इशारा करके मुझे विनम्रता से ऑफिस से बाहर करा दिया। पापाजी के एक करीबी दोस्त ने मुझे सलाह दी कि पापा को थोड़ा समझाओ कि क्या करने जा रहे हैं। एक महीने यहां से वहां घूमने के बाद मैं खाली हाथ वापस लौट आया। रामानंद सागर के नज़रिये से ‘रामायण’ को खरीदने वाला कोई नहीं था।

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विक्रम बेताल से बनी रामायण

विक्रम बेताल का सफल प्रसारण करने के बाद रामानंद सागर रामायण बनाने के​ लिए आश्वस्त हो गए। ‘विक्रम और बेताल’ की स्टार कास्ट को ‘रामायण’ में भी फाइनल कर दिया गया। ‘विक्रम और बेताल’ के ‘राजा विक्रमादित्य’ अरुण गोविल बने ‘राम’ और कई एपिसोड्स में रानी के किरदार में नजर आई दीपिका चिखालिया ‘सीता’ बन गईं। राजकुमार सुनील लाहरी को ‘लक्ष्मण’ और दारा सिंह को ‘हनुमान’ के रोल में कास्ट कर दिया।

कांग्रेस सरकार को सता रहा था यह डर

‘रामायण’ और ‘महाभारत’ को दूरदर्शन यानी टीवी पर लाने को लेकर सरकार श्योर नहीं थी। डीडी के तत्कालीन अधिकारियों ने अपने तर्क रखे। उन्होंने कहा कि ये सीरियल हमारे आधिकारिक सांस्कृतिक महाकाव्य पर आधारित है। जिसका धार्मिक होना जरूरी नहीं। खुद वाल्मिकी ने ‘रामायण’ में मर्यादा पुरुषोत्तम राम का वर्णन एक इंसान के तौर पर किया है। ‘रामायण’ टेलीकास्ट होना शुरू हुआ। इसके बाद दिल्ली के गलियारों से एक तूफान चला आ रहा था। कांग्रेस पार्टी में कई नेताओं को लग रहा था कि ‘रामायण’ का दूरदर्शन पर प्रसारण उनके लिए नुकसानदायक हो सकता है। तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री बीएन गाडगिल की तरफ से एक बड़ी आपत्ति आई। उन्हें लगा कि हिंदू पौराणिक धारावाहिक हिंदू शक्ति को जन्म देगा, जिससे भाजपा का वोट बैंक बढ़ सकता है। उन्हें डर था कि ‘रामायण’ हिंदूओं में गर्व की भावना पैदा करके भाजपा की सत्ता में आने की संभावनाएं बढ़ाएगा। दूसरी ओर, सुनने में ये आ रहा था कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने खुद डीडी के अधिकारियों सुझाव दिया है कि ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे महान भारतीय महाकाव्यों का प्रसारण किया जाए क्योंकि ये महाकाव्य हमारी सांस्कृतिक विरासत थे, जिन्हें महिमामंडित करके दिखाया जाना चाहिए।

हिमालय से संदेश लेकर आये दिव्य साधु
‘रामायण’ की पॉपुलैरिटी ऐसी थी कि रामानंद सागर के घर और नटराज स्टूडियो में साधुओं का आना-जाना लगा रहता था। एक साधु ने रामानंद सागर को ऐसा ज्ञान दिया कि वो एकदम कॉन्फिटेंड हो गए। प्रेम सागर लिखते हैं कि एक बार बहुत जवान सा दिख रहा साधु स्टूडियो आया। पापाजी उससे मिलने गए और पूछा कि वो उसकी क्या मदद कर सकते हैं। उसने कहा कि वो हिमालय में बसे अपने गुरू का संदेश लेकर आया है। अचानक उसकी आवाज और टोन बदलकर आदेश देने वाली हो गई। पापाजी चौंक गए। साधु ने उसने कहा- कौन हो तुम? किस बात का घमंड है, मैं ये नहीं करता, मैं वो नहीं करता, तुम क्या समझते हो, तुम ‘रामायण’ बना रहे हो, तो किस बात की चिंता कर रहे हो? दिव्य लोक में एक योजना विभाग है। भारत जल्द ही दुनिया में लीडर बनने जा रहा है और तुम जैसे कुछ और लोग इसे लेकर जागरुकता फैला रहे हैं। काम करो और वापस आ जाओ।

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