दो सौ किलोमीटर के फासले पर हैं पीएम और सीएम, क्या संवरेगी पूर्वांचल की सूरत

जिस पूर्वांचल ने चार-चार प्रधानमंत्री और एक दर्जन मुख्यमंत्री दिए, आज सूबे के दस सबसे गरीब जिलों में उसी पूर्वांचल के नौ जिले आते हैं। श्रावस्ती सूबे का सबसे गरीब जिला बना हुआ है। आज एक ही समय में। पूर्वांचल के पास प्रधानमंत्री मोदी भी हैं और मुख्यमंत्री योगी भी हैं। सिर्फ दो सौ किलोमीटर का फासला है बनारस और गोरखुर के बीच। दिल्ली से इतर देश का एक पीएमओ 2014 में ही बनारस में खुल चुका है तो अब गोरखपुर में भी एक सीएमओ स्थापित होने जा रहा है।

देश और सूबे की दोनों ताकतवर हस्तियां आज की डेट में पूर्वांचल से नाता रखती हैं। योगी के साथ पूर्वांचल के  डेढ़ दर्जन मंत्रियों ने भी शपथ ली। इससे पहले मोदी ने केंद्रीय कैबिनेट में कलराज मिश्रा, महेंद्र पांडेय, मनोज सिन्हा, अनुप्रिया पटेल को शामिल कर पूर्वांचल को खासा तवज्जो दे ऱखा है। मगर सवाल उठता है कि केंद्र और राज्य में इतनी बंपर नुमाइंदिगी वाले पूर्वांचल की किस्मत क्या संवरेगी। क्या पिछड़ेपन और गरीबी का माथे पर लगा कलंक धुर पाएगा। क्योंकि मोदी और योगी के राज में भी अगर पूर्वांचल के हाथ कुछ नहीं लगा तो फिर आगे उम्मीद बेमानी है। दरअसल पूर्वांचल हमेशा मुगालते में जीता रहा।

केंद्र और राज्य के लिए सत्तानायक खूब पैदा किए, मगर हासिल कुछ खास नहीं कर पाया।  और नहीं तो क्या। भला सोचिए जिस पूर्वांचल ने कमलापति त्रिपाठी, वीरबहादुर सिंह, श्रीपति मिश्रा, राजनाथ सिंह सहित एक दर्जन मुख्यमंत्री दिए, उस इलाके को आज पिछड़ापन और गरीबी का कलंक क्यों ढोना पड़ता। यहां हर मुमकिन शक्ल में समस्याएं खड़ी हैं। चाहे वह शिक्षा, स्वास्थ्य हो या फिर उद्योग धंधा। यूपी की 40 फीसद जनता पिछड़ापन, गरीबी, बेरोजगारी, लाचारी व बेबसी का दंश झेलने के लिए अभिशप्त है।

पूर्वांचल के कुल 28 जिलों के 34 लोकसभा सीटों के अन्तर्गत 170 विधानसा सीटे हैं।

दोस्तों कुछ आंकड़ों से बात शुरू करता हूं। कुछ समय पहले यूपी सरकार की एक रिपोर्ट पर नजर पड़ी थी। जिसमें पूर्वांचल की गरीबी के पक्के सुबूत थे। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2011-12 में पूर्वांचल के 28 जिलों की सालाना प्रति व्यक्ति औसत कमाई महज 13,058 रुपये थी। यानी इस जमाने में महीने के एक हजार रुपये। जबकि 24 हजार रुपये सालाना कमाई वालों को भी सरकार गरीब मान लेती है। मगर सोचिए, गरीबी के लिए तय पैमाने से भी आधी कमाई यहां के लोग कर रहे हैं। आपको बता दूं पूर्वांचल की यह प्रति व्यक्ति कमाई उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय 18,249 रुपये की तीन-चौथाई व देश की प्रति व्यक्ति आय 38,048 रुपये की लगभग एक-तिहाई है। आंकड़ों में उद्योग धंधों की बात करते हैं।

Gyan Dairy

पूर्वांचल में प्रति एक लाख की आबादी पर जहां 0.8 उद्योग स्थापित हैं, वहीं पश्चिमी यूपी में एक लाख की आबादी पर केवल 0.5 उद्योग हैं। इसी तरह पूर्वांचल में एक लाख की आबादी पर 107 मज़दूरों को रोजगार मिला, वहीं पश्चिमी यूपी में सात गुना यानी 724 है।  यहां औद्योगिक उत्पादन से प्रति एक लाख की आबादी पर हर महीने 201 रुपये की आमदनी है, तो पश्चिमी यूपी में यह 13,887 रुपये है। नए-कल कारखानों की बात छोड़िए।  पिछले पांच वर्षों में रायबरेली, अमेठी एवं सुलतानपुर में बंद हुईं 64 मिलों को फिर से चालू करने की मांग की। प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में ही एक दशक के बीच 60 कल-कारखानों पर ताले लटक गए। आसपा के जिलों में  बलिया में 25, भदोही में 75 और मिर्जापुर में 65, चंदौली में 60 और गोरखपुर में 80 छोटे-बड़े उद्योग भी बंद हो गए। पूर्वांचल के मैनचेस्टर कहे जाने वाले मऊ में बुनकरी का धंधा बेहाल है। बनारसी साड़ियों का कारोबार ठप है।

कालीन के लिए दुनिया में मशहूर मिर्जापुर, भदोही में भी बुनकर बदहाल हैं। नए उद्योग लगे नहीं और पुराने बंद होते गए। यही वजह है कि दिल्ली, मुंबई,सूरत, पंजाब जाने वाली ट्रेनों में आज भी भूसे की तरह भरकर यहां के लोग मजदूरी करने जाते हैं। पिछली सपा सरकार में बनारस से भाजपा विधायक श्यामदेव राय चौधरी दादा ने जब सदन में पूर्वांचल में नए कारखाने न लगने का मुद्दा उठाया था और उद्योग विकास की दिशा में सरकार के एक्शनप्लान की जानकारी चाही थी तब सीएम अखिलेश ने जानते हैं क्या जवाब दिया। उन्होंने कहा कि 2004 में बनी औद्योगिक नीति के तहत उत्तर प्रदेश वित्त निगम और प्रादेशिक औद्योगिक एवं इंवेस्टमेंट निगम (पिकप) की ओर से दर्जन भर से ज़्यादा औद्योगिक इकाइयों की स्थापना के लिए क़र्ज़ दिया गया था, लेकिन 8 वर्षों में एक भी इकाई स्थापित नहीं हुई है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया था कि मायावती के शासन में हैप्पीनेस टैक्स के कारण कोई भी औद्योगिक घराना यूपी नहीं आया। सवाल उठता है कि उनके राज में कितने घराने आए। थोड़ा अतीत में चलते हैं।

जब जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री रहे, उस समय गाजीपुर के सांसद विश्वनाथ प्रसाद गहमरी ने संसद में पूर्वांचल के पिछड़ेपन का मुद्दा उठाया था। कहा था कि गरीबी ऐसी है कि गोबर से अनाज निकालकर लोग खाने को मजबूर हैं। उनकी इस बात से हैरान रहे नेहरू ने पूर्वांचल के आर्थिक व सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए पटेल आयोग का गठन किया। मगर इस रिपोर्ट की सिफारिशें लापता हो गईं। फिर लंबे अरसे बाद 1991 में भाजपा की कल्याण सरकार ने पूर्वांचल विकास निधि की स्थापना की। ताकि पूर्वांचल का विकास हो सके। मगर आने वाली सरकारों ने इस बजट को सिर्फ लूटा-खसोटा। और भी बहुत सी समस्याएं हैं। हर साल आजमगढ़, देवरिया,  गाजीपुर , बलिया, कुशीनगर, गोंडा और बहराइच आदि जिलों में 5,000 से ज्यादा गांव बाढ़ में तबाही झेलते हैं।

गोरखपुर में जापानी इंसेफ्लाइटिस जैसी घातक बीमारी अक्सर विकराल रूप धारण करती है। पिछले तीन दशक में दस हजार से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। वहीं इस बीमारी से ग्रसित होकर सैकड़ों बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से दिव्यांग हो चुके हैं। आपको बता दें कि पूर्वांचल भले पिछड़ा है मगर संसाधनों के लिहाज से बहुत समृद्ध भी। मगर सरकारों ने यहां के संसाधन नोचकर दूसरे क्षेत्रों का ही भला किया है। पूर्वांचल का सोनभद्र सात हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन करता है। जो यूपी में कुल बिजली उत्पादन का आधा है। सबसे बड़ाऔर चूना पत्थर की खदान भी यहीं हैं। इतना ही नहीं बनारस और कुशीनगर में यूपी के 65 प्रतिशत से अधिक पर्यटक आते हैं। बता दें कि

Share