सुप्रीम कोर्ट का केन्द्र सरकार से सवाल, राजद्रोह कानून का वर्तमान में क्या औचित्य, हटाते क्यों नहीं ?

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए राजद्रोह कानून को औपनिवेशिक काल का बताते हुए सरकार से पूछा है कि इस कानून का वर्तमान में क्या औचित्य है। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से पूछा है कि आखिर इस कानून को हटाया क्यों नहीं जा रहा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अंग्रेजों ने स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने के लिए ये कानून बनाया था। चीफ जस्टिस एनवी नमन्ना की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि हमारी मुख्य चिंता इस कानून के दुरुपयोग को लेकर है।

आईपीसी की धारा 124 A (राजद्रोह) को चुनौती देते हुए पूर्व सैन्य अधिकारी मेजर जनरल एसजी वोम्बाटकेरे ने याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह कानून पर ‘औपनिवेशिक-काल’ के दंडात्मक कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एसजी वोम्बाटकेरे की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि राजद्रोह कानून का दुरुपयोग चिंता का विषय है। लिहाजा सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से सवाल किया है कि राजद्रोह पर कानून को समाप्त क्यों नहीं किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘राजद्रोह कानून का मकसद स्वतंत्रता संग्राम को दबाना था। अंग्रेजों ने इस कानून का इस्तेमाल महात्मा गांधी और अन्य को चुप कराने के लिए किया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि राजद्रोह कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए कुछ दिशानिर्देश निर्धारित किए जा सकते हैं। अर्टानी जनरल केके वेणुगोपाल ने कानून की वैधता का बचाव किया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे वक्त में जब पुराने तमाम कानूनों को हटाया जा रहा है, तब इसकी क्या जरूरत है।

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ये है राजद्रोह कानून
भारतीय दंड संहिता की धारा 124A के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति शब्दों, लेखन, चिह्नों, दृश्य माध्यम या फिर अन्य किसी माध्यम से भारत में कानून के तहत बनी सरकार के खिलाफ विद्रोह भड़काता है तो उसे उम्रकैद तक की सजा दी जा सकती है। इसके अलावा जुर्माना भी लगाया जा सकता है। इस धारा के तहत यदि कोई अपराध करता है तो वह गैर-जमानती होगा। बता दें कि 1962 में केदारनाथ यादव बनाम बिहार सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून की वैधता बरकरार रखी थी।

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