देश में मुसलमानों का असली ‘दुश्मन’ कौन ?

हालांकि पिलछा ब्लाक प्रदेश का हर चौथा भिखारी मुसलमान है। 121 करोड़ के हिंदुस्तान में 18 करोड़ मुसलमान हैं। कुल जनसंख्या में हिस्सा है करीब 14 प्रतिशत का, मगर भिखारियों की आबादी में उनकी तादाद कहीं ज्यादा 24.9 प्रतिशत है। यह मैं नहीं 2011 की जनगणना के आंकड़े बोलते हैं। आजादी के वक्त जब साढ़े तीन करोड़ मुस्लिम थे, तब सरकारी नौकरियों में उनकी 33 फीसद हिस्सेदारी थी, आज जब 14 प्रतिशत आबादी है तो हिस्सेदारी घटकर महज पांच प्रतिशत हो गई है। 88 लाख सरकारी कर्मचारियों में महज 4.4 लाख ही मुसलमान हैं। मैं नहीं जानता कि मुसलमानों की मुफिलिसी बयां करने के लिए अब और उदाहरण देने की जरूरत है।

मुसलमानों को सोचना होगा कि उनका यह हाल किसने किया। जिस मोदी और योगी का मुसलमानों को खौफ दिखाया जा रहा है, क्या वे मुस्लिमों की इस मुफिलिसी के जिम्मेदार हैं। या फिर वे जिम्मेदार हैं जो खुद को उनका रहनुमा कहते रहे मगर हर बार मुस्लिमों की तरक्की के काफिले को रहबर बनकर लूटते रहे। मुस्लिमों को न मोदी ने और न ही किसी भगवाधारी योगी ने कभी छल, बल्कि उन्हें उनके कथित रहनुमाओं ने ही गरीबी-बेगारी, पिछड़ेपन की डगर पर ढकेलना का एकसूत्रीय काम किया। संघ. भाजपा का खौफ दिखाओ और वोट लो। यह फंडा पहले आजादी के बाद कांग्रेस ने इस्तेमाल किया फिर सबसे बड़े सूबे यूपी में सपा-बसपा जैसे क्षेत्रीय दलों ने यह हथकंडा अपना लिया।

मुस्लिमों को कठपुतली बनाकर सियासी दल कभी ‘डीएम’ तो कभी ‘वाईएम’ वोटबैंक का खेल खेलते रहे। कभी कांग्रेसी नेताओं ने उनके वोटों की दलाली की तो कभी बहनजी खुलेआम दो से तीन करोड़ में दलित-मुस्लिम वोटों का टेंडर निकालती रहीं। यूपी के 19 और देश के 14 फीसद मुसलमान उन्हें आंख मूंदकर वोट देकर चुनाव जिताते रहे। उनके वोटों से जीते नेता अरबपति होते रहे, मगर मुस्लिम मुफलिसी की डगर पर और तेज बढते रहे। मुस्लिमों को सोचना होगा कि अगर आज वे बदहाल हैं तो उसमें किसका हाथ है। रहनुमाओं की खाल में छिपे आखिर वे रहबर कौन हैं, जो उन्हें हमेशा पिछड़ा बनाए रखना चाहते हैं।

चंद सवाल दिमाग में हैं। क्या 2014 में मोदी की सरकार बनने के बाद मुसलमान सबसे ज्यादा गरीब हो गए ? क्या सिर्फ पिछले तीन वर्षों में ही उनकी नौकरियों में हिस्सेदारी घट गई? आजादी के बाद सबसे ज्यादा शासन तो कांग्रेस ने किया, जो खुद को मुस्लिमों का मसीहा कहते नहीं अघाती। उसी कांग्रेस पार्टी के शासनकाल में मुस्लिमोकी हालत बद से बदतरह होती गई। जब-तब मुस्लिमों की गरीबी, पिछड़ापन का मुद्दा उठा भी तो कभी रंगनाथ मिश्रा कमेटी तो कभी सच्चर कमेटी गठित करने का लॉलीपॉप देकर आवाज को नक्कारखाने की तूती बना दी गई। इन कमेटियों ने मुस्लिमों की बदहाली के चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए। 2005 में गठित जस्टिस सच्चर कमेटी की रिपोर्ट तो 2006 में ही आ गई थी, उसके बाद 2014 की शुरुआत तक तो कांग्रेस की ही सरकार रही। मगर मुस्लिमों का कितना भला हुआ, सब जानते हैं। एक प्रकार से देखें तो सच्चर कमेटी की रिपोर्ट कांग्रेस राज में मुस्लिमों की बदहाली पर सरकारी मुहर थी।

यह रिपोर्ट सिर्फ रिपोर्ट नहीं बल्कि अल्पसंख्यकों की तरक्की के मोर्चे पर कांग्रेस सरकार के फेल होने का रिपोर्ट कार्ड रहा। सच्चर कमेटी ने अगर मुस्लिमों को दलितों के बराबर बेहाल पाया। सुबूत के तौर पर आंकड़े भी पेश किए तो सबसे बड़ा सवाल उठता है कि उन्हें इस हालत में आखिर किसने पहुंचाया। दरअसल आजादी के बाद से ही मुसलमानों को मजहब के दायरे में कैद कर सियासी पार्टियों ने उनके वोटबैंक का धंधा किया। भारतीय नागरिकता के ऊपर मजहबी लबादा हमेशा ओढ़े रखने को उन्हें मजबूर किया गया। मुस्लिम भाइयों को उनके झूठे सियासी रहनुमाओं ने संघ. अल्पसंख्यकवाद, बहुसंख्यकवाद. वगैरह. वगैरह के नाम पर इतना डरा दिया कि वे इसके आगे कुछ सोच ही नहीं सके। भूल गए कि तरक्की भी कोई चीज होती है। तरक्की की राह पर आगे बढ़ेंगे तो सुरक्षा खुद मिल जाएगी। कौन असली दुश्मन है, उसे मुसलमान कभी पहचान ही नहीं पाए। और न ही उन्हें पार्टियों ने अपने दुश्मनों को पहचानने दिया। क्योंकि इससे उनके खुद को बेनकाब हो जाने का खतरा था। कुछ मुस्लिम साथी सवाल उठा सकते हैं- हमें विकास नहीं पहले सुरक्षा चाहिए।

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भाजपा की तुलना में देश में कांग्रेस और यूपी में सपा-बसपा के राज में हम मुसलमान ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हों। आइए हम आपकी गलतफहमी दूर कर देते हैं। गुजरात में मोदी की सरकार थी तो गोधरा में 2002 में बहुत अफसोसनाक ढंग से दंगा हुआ। मगर यह सिर्फ एक घटना थी। इसी एक दंगे पर खूब चिल्लाकर मुसलमानों को डराया गया। मगर आप यह क्यों भूल जाते हैं गोधरा से ज्यादा कांग्रेसी हुकूमत मे हुए दंगों में मुसलमानों का खून हुआ। 70 के दशक में अहमदाबाद की सड़कें अक्‍सर खून से लाल होती रहती थीं। 1969 में अहमदाबाद में भीषण सांप्रदायिक दंगा हुआ, जिसमें 5000 मुसलमान मारे गए थे। उस वक्त राज्‍य में कांग्रेस सरकार थी और मुख्‍यमंत्री थे हितेंद्र भाई देसाई और देश की पीएम इंदिरा गांधी थीं। इसके बाद 1985, 1987, 1990 और 1992 में भी अहमदाबाद की सड़कें खून से लाल हुई।

यह सभी दंगे कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के राज में हुए। अगर मुझ पर विश्वास न हो तो मशहूर मुस्लिम बौद्धिक असगर अली इंजीनियर की किताब पढ़ लीजिए। 1984 से 1989 के बीच जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री रहे तो देश में दंगों की 4187 घटनाएं हुईं। जिनमें 2854 लोग मारे गए। पिछले 28 साल में से देश पर 18 साल कांग्रेस का राज रहा। इस दौरान कुल 8619 लोग दंगे में मारे गए। औसतन हर साल 478 लोग जान गंवाते रहे। वहीं दस साल गैर-कांग्रेसी शासन रहा, जिस दौरान 4283 लोग दंगों में मारे गए यानि हर साल औसतन 428 लोगों की दंगों में मौत हुई।

2012 से 2015 तक सपा शासन में दंगों का रिकॉर्ड टूट गया। एक आरटीआई में मिले गृहमंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक यूपी में सर्वाधिक 637 छोटे-बड़े दंगे हुए। इन दंगों में 162 लोगों की हत्या तो दो हजार लोग गंभीर रूप से घायल हुए। गृहमंत्रालय और एनसीआरबी के आंकड़े कहते हैं कि अब तक यूपी में बसपा सरकार में कुल 22347 सांप्रदायिक टकराव, दंगे की घटनाएं हुईं तो सपा सरकार में यह आंकड़ा 25007 है। खैर मुस्लिम बन्धुओं को अगर तरक्की की रफ्तार पकड़नी है, मुख्यधारा में आना है तो अपने असली दुश्मनों को पहचानना होगा।

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