उत्तरप्रदेश चुनाव 2017 : प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकारों के लिए भी परीक्षा है उत्तर प्रदेश का चुनाव

चुनावों में काम से ज्यादा गणित यानि जाति और धर्म के समीकरण और टेबल पर जीत की रणनीति, पोस्टर में नारे, नेताओं की सभाएं, कहां और कितनी. यही नहीं किस अंदाज में नेता बोलेगा. क्या बोलेगा, क्या पहनेगा किस रंग का पहनेगा. यह सब आजकल चुनावी रणनीतिकार तय कर रहे हैं. बड़े-बड़े नेताओं की जीत की जीत के लिए एक पूरी टीम कई पहलुओं पर विचार करती है. कहते हैं कि नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री निवास से 7 आरसीआर की दूरी तय करने में ऐसे ही रणनीतिकारों ने मदद की है. यह रणनीतिकार यह भी तय करते हैं कि नेता की सोशल साइट्स पर प्रोफाइल हो. उस प्रोफाइल पर क्या जाएगा यह भी यही एक्सपर्ट्स तय करते हैं. जरूरत पड़ी तो यह लोग फॉलोवर से लेकर लाइक्स तक खरीद कर सोशल साइट्स के जरिए भ्रम पैदा करते हैं या फिर कहें कि पार्टी के प्रति रूख मोड़ने का काम करते हैं.

बिहार में बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के बाद कांग्रेस पार्टी ने प्रशांत किशोर की सेवाओं के लिए संपर्क किया और उत्तर प्रदेश में लगभग हाशिए पर पहुंच गई कांग्रेस पार्टी को सत्ता में लाने के लिए प्रशांत किशोर जीजान से लग गए.

और आज के तकनीक के युग में फिलहाल ऐसे लोग कामयाब भी हो रहे हैं. देश में आजकल सबसे ज्यादा अगर किसी चुनावी रणनीतिकार की चर्चा हो रही है तो वह हैं प्रशांत किशोर. कहा जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इतनी ऊचाइंयों तक पहुंचाने में उन्होंने काफी योगदान दिया. इसके बाद वह किसी बात से नाराज़ हो गए और फिऱ बिहार के चुनावों से पहले किशोर ने नीतीश कुमार का दामन पकड़ा और जेडीयू के लिए रणनीति बनाई. बिहार में जेडीयू ने बीजेपी ने पहले ही नाता तोड़ लिया था और फिर उन्होंने लालू प्रसाद यादव की आरजेडी से गठबंधन कराया. इसमें कोई दो राय नहीं कि नरेंद्र मोदी की लहर के बावजूद बीजेपी बिहार में बुरी तरह हार गई और जेडीयू-आरजेडी का गठबंधन सत्ता में लौटा. वैसे चुनावों से पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का आरक्षण पर दिया बयान भी इस करारी हार का कारण बना था.

इसलिए कांग्रेस पार्टी के साथ-साथ इस बार के विधानसभा चुनाव चुनावी रणनीतिकारों के लिए भी एक इम्तिहान से कम नहीं है. कहा जाता है कि प्रशांत किशोर के कहने पर ही राहुल गांधी पहले उत्तर प्रदेश में अकेले दम पर चुनाव लड़ने की बात करते आ रहे थे. यहां तक की गठबंधन की किसी संभावना से वह इनकार कर रहे थे.

मगर उत्तरप्रदेश में इस चुनाव के लिए पार्टी के मुख्य रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने खाट सभाओं, लखनऊ में राहुल के कार्यक्रम और वाराणसी में सोनिया गांधी के रोड शो के बाद कांग्रेस हाईकमान को गठबंधन के बिना पार्टी की हालत नहीं सुधरने की हकीकत भी बता दी. कहा जाता है कि राहुल गांधी फिर भी गठबंधन के लिए तैयार नहीं थे. किंतु, गुलाम नबी आजाद और प्रशांत किशोर ने प्रियंका गांधी के जरिए राहुल गांधी को इसके लिए तैयार किया. यह तो प्रशांत किशोर भी जानते हैं कि जो कामयाबी अभी तक मिली वह एक हार से धुल जाएगी और यह संदेश चला जाएगा कि राजनीति में सिर्फ और सिर्फ काम बोलता है, पार्टी की छवि बोलती है, नेताओं का आचरण बोलता है, रणनीति काफी बाद की चीज है.

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वैसे राहुल गांधी ने जब से सक्रिय राजनीति में अकेले आगे बढ़ने का काम शुरू किया तब से वह पार्टी के लिए भी एकला चलो की रणनीति पर काम करने लगे थे. उनका मानना था कि गठबंधन के सहारे पार्टी को मजबूत नहीं किया जा सकता है. यही वजह रही कि 2009 के आम चुनाव में लालू प्रसाद यादव की आरजेडी से गठबंधन नहीं करने का चर्चित फैसला भी राहुल ने ही लिया था. उत्तरप्रदेश के 2017 के चुनावी महासंग्राम में भी पहले वह कांग्रेस के अकेले लड़ने की बात कह रहे थे. इस दिशा में किसान यात्रा और खाट सभा का एक महीने का बड़ा अभियान भी चलाया. माना जाता है कि किसान यात्रा और खाट सभा का उपाय भी जनाधार बढ़ाने के लिए प्रशांत किशोर ने ही दिया था. कुछ रिपोर्टों के अनुसार यहां तक की पार्टी के मजबूत करने के लिए अकेले चलने के स्टैंड को भी प्रशांत किशोर की रणनीति के तौर पर देखा गया.

पिछले चुनाव में बसपा के सोशल इंजीनियरिंग के लिए सतीश मिश्रा जैसे रणनीतिकारों को चुनावी समर का योद्धा माना गया था. लेकिन 2012 के विधानसभा चुनावों में सारी रणनीति धरी की धरी रह गई थी. इस बार कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के रणनीतिकारों की समझ कितना काम आती है यह देखना दिलचस्प होगा.

इसी के साथ कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी यह कबूल कर लिया है कि गठबंधन की राजनीति ही कांग्रेस की सियासी तकदीर बदलने का रास्ता है. इस हकीकत के अहसास का ही नतीजा है कि राहुल को भी आखिरकार 14 साल पहले सोनिया गांधी की गठबंधन की दिखाई राह पर लौटना पड़ा है. सोनिया ने तब पार्टी को संकट के दौर से निकालने के लिए ‘शिमला संकल्प’ में पहली बार गठबंधन की राजनीति की खुलकर वकालत की थी. 2003 में सोनिया गांधी ने पार्टी को संकट के दौर से निकालने के लिए शिमला शिविर में पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के भी गठबंधन की राजनीति के लिए तैयार होने की घोषणा की. तब लोकसभा में कांग्रेस के 114 सांसद थे जो उस वक्त उसकी सबसे कम संख्या थी. मगर 2004 के आम चुनाव में गठबंधन की राह पर चलने का सोनिया का फैसला पार्टी की किस्मत बदलने में कामयाब रहा. वामदलों के बाहरी समर्थन से कांग्रेस न केवल केन्द्र की सत्ता में लौटी बल्कि दस साल तक काबिज रही. हालांकि कांग्रेस तब भी उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे अपने पुराने परंपरागत प्रदेशों में ढाई दशक बाद भी चौथे नंबर की पार्टी से ऊपर नहीं आ सकी.

 

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