करवाचौथ केवल एक व्रत ही नहीं बल्कि एक उत्सव

नई दिल्ली। करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु की कामना के लिए करती है। करवाचौथ का पर्व कार्तिक मास की चतुर्थी तिथि को आता है। करवाचौथ की पूजा में मिट्टी के बर्तन का महत्व बहुत अधिक होता है। सुहागिन महिलाएं पूरे वर्ष इस दिन का इंतजार करती हैं। करवा चौथ को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें से कई कथाओं के अनुसार, करवाचौथ की परंपरा देवताओं के समय से चली आ रही है। कहा जाता है कि करवाचौथ केवल एक व्रत ही नहीं बल्कि एक उत्सव भी है। इस दिन का महत्व बहुत ही विशेष है। मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्‍य का वरदान प्राप्त होता है। इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं। सच्चे मन और श्रद्धापूर्वक यह व्रत करने से केवल अखंड सौभाग्य का वरदान ही नहीं बल्कि परिवार में सुख-समृद्धि और शांति भी आती है।

मान्यता है कि एक देवों और दानवों के बीच युद्ध छिड़ गया था। इस युद्ध में देवता, दानवों से हार रहे थे। तभी वे ब्रह्मदेव के पास गए और उनसे रक्षा करने की प्रार्थना की। देवताओं को इस परेशानी से बाहर निकालने के लिए ब्रह्मदेव ने सभी देवताओं की पत्नियों से कहा कि वो अपने-अपने पतियों के लिए व्रत करें। साथ ही उन्हें विजय दिलाने के लिए भी प्रार्थना करें। ब्रह्मदेव ने कहा कि ऐसा करने से देवताओं को युद्ध में विजय प्राप्त होगी। ऐसे में उनकी बात मानकर सभी देवियों ने व्रत करने की बात स्वीकर कर ली। जैसा ब्रह्मदेव ने कहा था उसी उसी तरह सभी देवियों ने कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन व्रत किया। साथ ही देवताओं की विजय की प्रार्थना की। देवियों का व्रत सफल हुआ और युद्ध में देवताओं की जीत हुई। जैसे ही सभी देवियों को यह बात पता चली तो उन्होंने अपना व्रत खोल लिया। माना जाता है कि तभी से करवाचौथ की परंपरा की शुरूआत हुई।

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