जाने कब है संकष्टी चतुर्थी, आखिरी इस दिन क्यों जरूरी होते हैं चंद्रदर्शन?

सनातन धर्म में सभी पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाये जाते हैं और सभी त्योहारों का जीवन में काफी प्रभाव भी पड़ता है। संकष्टी चतुर्थी को लेकर बहुत सी मान्यताएं हैं।भगवान गणेश को अन्य सभी देवी-देवताओं में सर्वप्रथम पूजा जाता है। श्रीगणेश को बुद्धि, बल और विवेक का देवता माना जाता है। भगवान गणेश के लिए किया जाने वाला संकष्टी चतुर्थी काफी प्रचलित है। इस दिन लोग मनचाहे वरदान की प्राप्ति के लिए भगवान गणेश की पूजा करने के साथ ही उपवास भी रखते हैं। इस साल संकष्टी चतुर्थी का व्रत 5 सितंबर 2020 (शनिवार) को है।

संकष्टी चतुर्थी का अर्थ-

संकष्टी चतुर्थी का अर्थ होता है- संकट को हरने वाली चतुर्थी। संकष्टी शब्द संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है- कठिन वक्त से मुक्ति पाना। संकष्टी चतुर्थी के दिन लोग अपने कष्टों से मुक्ति पाने के लिए भगवान गणेश की अराधना करते हैं। शास्त्रों के अनुसार, चतुर्थी के दिन गौरी पुत्र गणेश की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

ये हैं मान्यताएं-

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मान्यता है कि संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा करने से घर से नकारात्मका दूर होती है। घर में सुख-समृद्धि के साथ खुशहाली आती है। चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन का भी विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि सूर्योदय से शुरू होने वाला संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दर्शन के बाद ही समाप्त होता है। इसलिए संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रदर्शन जरूरी होते हैं।

ऐसे करें पूजन-

संकष्टी चतुर्थी के दिन प्रात:काल उठ जाएं।
इसके बाद साफ-सुथरे कपड़े पहन लें। इस दिन लाल रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है।
गणपति जी की पूजा की शुरूआत करें। पूजा के दौरान जातक का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखना चाहिए।
भगवान गणेश को तिल, गुड़, लड्डू, दुर्वा, चंदन और मीठा अर्पित करें।
गणपति जी के सामने धूप-दीप जलाकर गणेश वंदना का पाठ करें।
पूजा के बाद आप फलाहार खा सकते हैं।
शाम को चांद निकलने से पहले गणपति पूजा करें और संकष्टी व्रत कथा का पाठ करें।
रात को चंद्र दर्शन के बाद व्रत को खोलें।

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