11 मार्च को है महाशिवरात्रि, जाने रात में जागरण करने के पीछे क्या है महत्व

आने वाले 11 मार्च को महाशिवरात्रि का पर्व है. हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास साल का आखिरी महीना होता है. इसी माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि आती है. मान्यता है कि महाशिवरात्रि के दिन महादेव का व्रत व पूजन करने से वे अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तों की हर मनोकामना को पूरा करते हैं.

हिंदू शास्त्रों में महाशिवरात्रि की पूरी रात जागकर महादेव की आराधना करने की बात कही गई है. जानते हैं महाशिवरात्रि की रात जागरण के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व के बारे में.

ये है धार्मिक महत्व
यदि धार्मिक महत्व की बात करें महाशिवरात्रि की रात को शिव और माता पार्वती के विवाह की रात माना जाता है. इस दिन शिव ने वैराग्य जीवन से गृहस्थ जीवन की ओर कदम रखा था. ये रात शिव और पार्वती माता के लिए बेहद खास थी. मान्यता है कि जो भक्त इस रात में जागरण करके शिव और उनकी शक्ति माता पार्वती की आराधना और भजन वगैरह करते हैं, उन भक्तों पर शिव और मां पार्वती की विशेष कृपा होती है. उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन के तमाम कष्ट दूर हो जाते हैं. इसलिए महाशिवरात्रि की रात को कभी सोकर गंवाना नहीं चाहिए.

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वैज्ञानिक महत्व भी जानें
वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो भी महाशिवरात्रि की रात बेहद खास होती है. दरअसल इस रात ग्रह का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार अवस्थित होता है कि मनुष्य के भीतर की ऊर्जा प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर जाने लगती है. यानी प्रकृति स्वयं मनुष्य को उसके आध्यात्मिक शिखर तक जाने में मदद कर रही होती है. धार्मिक रूप से बात करें तो प्रकृति उस रात मनुष्य को परमात्मा से जोड़ती है. इसका पूरा लाभ लोगों को मिल सके इसलिए महाशिवरात्रि की रात में जागरण करने व रीढ़ की हड्डी सीधी करके ध्यान मुद्रा में बैठने की बात कही गई है.

मासिक शिवरात्रि से अलग है महाशिवरात्रि
देखा जाए तो हर माह में अमावस्या से एक दिन पहले यानी कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि कहा जाता है. लेकिन फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी महाशिवरात्रि कहलाती है. इस मामले में तमाम ज्योतिषियों का मानना है कि हर माह अमावस्या की रात चंद्रमा पूरी तरह क्षीण होता है. ऐसे में माह को क्षय होती तिथि अमावस्या के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए एक रात पहले चतुर्दशी तिथि को शिवरात्रि मनाई जाती है और शिव जी की आराधना की जाती है. ठीक उसी प्रकार हिंदू नव वर्ष शुरू होने से ठीक एक महीने पहले फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि के तौर पर पूजा जाता है ताकि क्षय होते साल के दुष्प्रभाव से नए साल को बचाया जा सके.

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