आज है भीष्म अष्टमी, जाने व्रत रखने से क्या होता है लाभ

सनातन धर्म में हर व्रत का जीवन पर एक विशेष महत्व होता है। माघ मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को भीष्म अष्टमी का व्रत रखा जाता है। इसी दिन गंगा पुत्र भीष्म ने अपने प्राण त्याग किये थे। इस दिन जहां एक ओर व्रत रखने का महत्व है वहीं दूसरी ओर इस दिन भीष्म की आत्मा की शांति के लिए तिल के जल से तर्पण भी किया जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, भीष्म अष्टमी का दिन पितृ दोष को समाप्त करने का उत्तम दिन माना जाता है। साथ ही योग्य संतान प्राप्ति के लिए यह व्रत किया जाता है। जो दंपत्ति संतानविहिन हैं, उन्हें इस व्रत को करने से लाभ मिलता है। भीष्म पितामह के आशीर्वाद से अच्छे चरित्र और आज्ञाकारी संतान की प्राप्ति होती है। इस बार भीष्म अष्टमी 19 फरवरी, शुक्रवार को मनाई जाएगी।

भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। महाभारत के युद्ध में अत्यंत घायल होने के बाद भी भीष्म पितामह ने अपने वरदान के बल पर अपने शरीर का त्याग नहीं किया। पितामह ने अपने शरीर को त्यागने के लिए माघ शुक्ल अष्टमी का दिन चुना, क्योंकि इस समय तक सूर्यदेव उत्तरायण की ओर प्रस्थान करने लगे थे। उन्होंने इसी दिन को अपनी मृत्यु के लिए चुना था। इसीलिए इस दिन व्रत रखा जाता है। भीष्म अष्टमी का उत्सव देश के विभिन्न क्षेत्रों में बहुत मान्यता के साथ होता है। खासतौर पर भगवान विष्णु के मंदिरों में भीष्म पितामह के सम्मान में भव्य उत्सव का आयोजन किया जाता है।

भीष्म अष्टमी का मुहूर्त

माघ शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि प्रारंभ – 19 फरवरी, शुक्रवार को सुबह 10 बजकर 58 मिनट से
माघ शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि समापन – 20 फरवरी, शनिवार दोपहर 01 बजकर 31 मिनट तक

भीष्म अष्टमी का महत्व

माघ मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को भीष्म अष्टमी मनाई जाती है। इस दिन व्रत रखने को अधिक महत्व दिया जाता है। इस दिन जो भी व्यक्ति तिल के जल से तर्पण करता है। उसे संतान और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही इस दिन व्रत रखने से पापों का नाश भी होता है। इस दिन भीष्म पितामह की आत्मा की शांति के लिए भी तर्पण किया जाता है, जिससे उनका आशीर्वाद प्राप्त हो सके। जो भी व्यक्ति ऐसा करता है उसे पितामह भीष्म जैसी आज्ञाकारी संतान की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही इस दिन पितामह भीष्म का तर्पण करने से पितृ दोष से भी मुक्ति मिलती है। इसलिए इस व्रत को अधिक महत्व दिया जाता है।

इस मंत्र का करें जाप

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भीष्म अष्टमी पर जल या पवित्र नदी में स्नान के बाद निम्निलिखित मंत्र का जाप करना चाहिए। साथ ही गरीबों को दान दक्षिणा देते हुए अपने पितृों को याद करना चाहिए। अंत में हाथ जोड़कर भीष्म पितामह को याद करते हुए प्रणाम करें और अपने पितरों को भी प्रणाम करें। इससे पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।

वैयाघ्रपदगोत्राय सांकृतिप्रवराय च। गंगापुत्राय भीष्माय
प्रदास्येहं तिलोदकम् अपुत्राय ददाम्येतत्सलिलं भीष्मवर्मणे ।।

ये है भीष्म अष्टमी की पौराणिक कथा

कथा के अनुसार भीष्म पितामह का असली नाम देवव्रत था। वह हस्तिनापुर के राजा शांतनु की पत्नी और मां गंगा की कोख से उत्पन्न हुए थे। एक बार राजा शांतनु शिकार खेलते-खेलते गंगा तट पर पहुंच गए। वहां से लौटते समय उनकी भेंट हरिदास केवट की पुत्री मतस्यगंधा से हुई। जिनकी सुंदरता पर वो मोहित हो गए राजा शांतनु ने मतस्यगंधा के पिता से उनका हाथ मांगा लेकिन मतस्यगंधा के पिता ने उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया और कहा कि आपका जयेष्ठ पुत्र देवव्रत है। जो आपके राज्य का उत्तराधिकारी है यदि आप मेरी पुत्री के पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी बनाने की घोषणा करते हैं तो ही मैं अपको अपनी पुत्री का हाथ देने को तैयार हूं।

राजा शांतनु इस बात को मानने से मना कर देते है इस बात को लेकर कुछ समय बीत जाता है पर वो मतस्यगंधा को नही भूल पाते और व्याकुल रहने लगते हैं। यह सब देखकर उनके पुत्र देवव्रत ने उनकी व्याकुलता का कारण पुछा और सब बात जानने के बाद वो केवट हरिदास के पास जाते हैं जिसके बाद उनकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए हाथ में गंगाजल लेकर प्रतिज्ञा लेते हैं कि मैं आजीवन अविवाहित ही रहुंगा।

पिता के लिए उन्होने ये प्रण लिया। ऐसी कठिन प्रतिज्ञा के लिये उनका नाम भीष्म पड़ा। उनके पिता ने प्रसन्न होकर उनको मनचाही मृत्यु का वरदान दिया महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद उन्होने अपना शरीर त्यागा। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यह माना जाता है कि जो व्यक्ति उत्तरायण के शुभ दिन पर अपना शरीर त्यागता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है, इसलिए उन्होंने कई दिनों तक बाणों की शैय्या पर प्रतीक्षा की और अंत में अपने शरीर को छोड़ दिया। उत्तरायण अब भीष्म अष्टमी के रूप में मनाया जाता है।

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