मोदी के संसदीय क्षेत्र की यह होनहार छात्रा पहलवानी में भारत का नाम दुनिया में करेगी रोेशन

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की बीस साल की छात्रा आस्था वर्मा का दावा है कि महिला पहलवानी के क्षेत्र में वह पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन कर सकती है। मगर गरीबी ही उसकी राह की सबसे बडी बाधा है। इस शहर के सोनारपुरा मोहल्ले में चिंतामणि गणेश मंदिर के सामने फूलमाला बेचकर इसकी विधवा माँ को अपने परिवार का पेट पालना पड़ता है। ऐसे में आस्था को सूखी रोटी और सूखी दाल के अलावा एक गिलास दूध तक नहीं दे पाती हैं यह। लेकिन, रूखासूखा खाकर ही आस्था ने भारत में अपनी एक पहचान तो बना ही ली है। पढने में भी अव्वल। बी.ए. प्रथम वर्ष में पढने वाली इसने हाईस्कूल और इंटर की परीक्षाओं में उच्च प्रथम श्रेणी हासिल की है।

जम्मू-काश्मीर के श्रीनगर, झारखंड के रांची शहर और दूर दक्षिण के कन्याकुमारी जैसे अनेक स्थानों में जाकर कुश्ती में अपने शहर वाराणसी का नाम रोशन किया है। खाली हाथ कहीं से भी नहीं लौटना पडा है।

सिर्फ 12 साल में ही। उस समय मैं स्कूली छात्रा थी। उसी दौरान एक दिन मुझे कबड्डी खेलते हुए देखकर मेरे गुरूजी गोरखनाथजी मुझसे बहुत प्रभावित हुए। बाद में उन्होंनें मुझे कुश्ती लडने के लिये प्रेरित किया और आगे की राह भी दिखाई। इसके कुछ ही दिनों के बाद मैंने घर के पास के ही एक जिम में जाना शुरू कर दिया।

पढने में भी मेरी काफी रुचि है। हरिश्चंद्र कालेज में बी.ए. पहले साल में पढ रही हूँ। हाईस्कूल और इंटर की कक्षाओं में उच्च प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुई हॅू।

इससे महीने में जो कुछ भी मिल जाता है, उसे मेरी माँ हम भाई बहनों की पढाई में खर्च कर देती हैं। बाकी खर्चा मेरे मामाजी उठाते हैं।

मेरी माँ मधु, बडी बहन अस्मिता और छोटा भाई आकाश। पिताजी का लगभग 14 साल पहले ही निधन हो गया है। फिर लोगों ने मेरी माँ को घर से निकाल कर मकान पर कब्जा कर लिया गया। इसके बाद नानाजी हम लोगो को अपने साथ ले आये और इसी जगह पर माँ को फूल माला बेंचने के धंधे में लगा दिया।

माँ की मदद की सोचकर दुकान में भी नियमित रूप से हम दोनों बहने बैठते हैं। बडी बहन अस्मिता एम.ए. करने के बाद आगे की पढाई कर रही है।

कहाँ हो पाता है? इस गरीबी में दोनो समय सूखी रोटी और सूखी दाल मिल जाय, यही बहुत है। एक गिलास दूध तक तो नहीं मिल पाता है। अगर मुझे सही खुराक मिलने लगे, तो मैं पूरी गारंटी के साथ कह सकती हूँ कि एक दिन भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन कर दूँगी।

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वोट तो दिया है। यह मैं भी जानती हॅू। लेकिन, उन तक मेरी बात पहुंचे तों कैसे? कोई सोर्स नहीं है।

तो क्यों नहीं अपने सांसद और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से अपनी बात कहती? उन्हें तुम्हारे बारे में खबर लगनी चाहिये। अब तक न जाने कितने लोगों की मदद उनका पी.एम.ओं. कर चुका है और लगातार कर रहा है। फिर, तुम तो उनके संसदीय क्षेत्र की हो। तुम्हारी माँ का कहना है उनके पूरे परिवार ने मोदीजी को ही वोट दिया है।

जिम में रोजाना कितनी देर तक रहना पडता है? वहाँ क्या तुम्हें लडकों के साथ भी कुश्ती लडने का अभ्यास करना पडता है?

हाँ। वैसे मेरी सहेली नंदिता सरकार को भी पहलवानी का शौक है। ज्यादातर उसी से कुश्ती लडती हूँ। लेकिन, सिर्फ इतना ही काफी नहीं होता है। लडकों से भी कुश्ती लडती हूँ।शुरू शुरू में तो बडा अजीब लगता था। उलझन भी होती थी। लेकिन, अब तो आदत बन चुकी है।

साफ पानी तक तो मिलता नहीं है। हैंडपंप से गंदा और बालूमिला पानी आता है। वह पिया नहीं जाता। कुश्ती लडने के लिये अच्छे गद्दे भी नहीं है। पहले तो फटे गद्दे पर ही लडना पडता था। फिर गद्दा खरीदा भी गया, तो हल्का सा। इससे चोट अभी भी लगती रहती है। कुश्ती के अभ्यास के समय यदि किट मिल जाती, तो भी बडी सुविधा होती। लेकिन, इन सब जरूरी बातों के लिये किससे कहे? कोई सुनने वाला भी तो हो। इसलिये चोट लगती ही रहती।

धोबियापछाड दांव। इसमें यूं गर्दन दबाई। फिर झटके से हवा में उछाल दिया, तो पल भर में ही वंदा धडाम।

यह भी कोई सवाल है? आप इस देश में नहीं रहते हैं क्या? देखते नहीं हैं कि देश और दुनिया में हमारे सांसद का कितना नाम हो रहा है। बहुत ही अच्छी सरकार है। उनकी ही प्रेरणा से हमारा शहर अब बहुत साफसुथरा रहता है। बिजली पानी की काफी अच्छी सप्लाई होने लगी है। सडकें चैडी हो रही हैं। अतिक्रमण हटाया जा रहा है। उपरिगामी सेतु बनाये जा रहे हैं। इनकी सरकार की कौशल विकास योजना का पूरा लाभ हम दोनों बहनें उठा रही हैं। मुफ्त में कम्प्यूटर की शिक्षा ले रही हूँ। अपने मन की कहूँ, तो हमारे सांसद साधारण व्यक्ति नहीं, युगपुरुष हैं। हर दिन उनके काम तो देखकर लोग दांतों के नीचे अंगुली दबा लेते हैं। कितना काम करते है। उत्तर प्रदेश के लिये मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ भी दूसरे मोदी हैं। मैं, मेरी बहन अस्मिता और माँ तीनों लोग दुकान बंद कर रोज रात में लगभग 11 बजे घर जाते हैं। लगभग डेढ किलोमीटर तक पैदल ही जाना पडता है। मगर क्या मजाल कि कोई मनचला छेडखानी तो क्या, गंदे इशारे तक करने की हिम्मत कर सके। इन दोनों की ही वजह से देश और प्रदेश दोनों के दिन बहुर आये हैं। बस थोडा सा ही और इंतजार करना पडेगा।

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