सासाराम की पुष्पांजलि बनी काशी की तारणहार

जी हां सासाराम जिला रोहतास (बिहार) की बेटी पुष्पांजलि शर्मा न थकने वाली पथिक है। इन दिनों योग के माध्यम से वह काशी की तारणहार साबित हो रही हैं। समाज की दुखियारी बेटियों के जीवन में पुष्पांजलि ने इच्छाशक्ति की जो ज्योति जलाई है उसकी जितनी तारीफ की जाए वह कम है। कहने को तो पुष्पांजिल काशी में बहू बनकर आईं लेकिन आज वह सबके दिलों में बेटी बनकर छा गई हैं। काशी में आज शायद ही कोई ऐसा हो जो योग गुरु पुष्पांजलि शर्मा से परिचित न हो। दूरभाष पर हुई बातचीत में पुष्पांजलि ने बताया कि मैं मूलतः सासाराम की रहने वाली हूं लेकिन पिताजी शासकीय मुलाजिम थे सो वह जहां भी गये हम वहीं के हो गये। बचपन से ही मेरे मन में कुछ विशेष करने की ललक थी सो अपनी सकारात्मक सोच को दीन-दुखियों की सेवा में लगाने का संकल्प लिया। पढ़ाई की, उसके बाद केरल से योग की तालीम हासिल करने के बाद मन में विचार आया कि योग के माध्यम से समाज को क्यों न निरोगी रखा जाए।

पुलिस विभाग में सम्मानित पद पर कार्यरत पिता को देखकर पुष्पांजलि ने कभी सिविल सेवा में जाने का ख्वाब संजोया था। तैयारी भी शुरू कर दी थी। उस युग में शहरों में कम्प्यूटर सामान्य घरों के लिए दुर्लभ हुआ करता था, पुष्पांजलि की जिद पर पिता ने पिछड़े कस्बे में तैनाती होने के बावजूद कम्प्यूटर खरीदने का साहस किया। हालांकि तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों में जब भी पुष्पांजलि उच्च शिक्षा और सिविल सेवा में जाने का अपना इरादा जतातीं तो पिता को छोड़ बाकी परिजन उन्हें हतोत्साहित करते। कुछ लोग तो यहां तक तंज कसते कि अब ससुराल में जाकर हाकिम बनने का सपना पूरा करना।  यहां तो कामभर की पढ़ाई करा दी गई है। गंवई मानसिकता के बीच झल्लाती, घुटती पुष्पांजलि की डोली सजने की बारी आई तो पिता के सामने विद्वान ससुर ने भरोसा दिया कि बेटा तुम जितना पढ़ना चाहोगी, हम तुम्हें पढ़ाएंगे। यहां तक कि प्राचीन विचारों, परम्पराओं की पोषक सास ने भी मुस्कराकर कहा था कि तुम बहू नहीं बेटी हो हमारी। हम तुम्हें बेटी की तरह ही प्यार और आजादी देंगे।

फिलवक्त पुष्पांजिल वाराणसी में रहकर दुनिया भर में योग और फिटनेस की ज्योति जला रही हैं। पुष्पांजलि शर्मा एक पत्नी और मां होने के बाद भी जिस तरह योग की अलख जगा रही हैं वह आसान बात नहीं है। वह कहती हैं कि योग और जीवन को नियम-अनुशासन में बांधकर चलने से तन-मन सब अजेय रूप में परिलक्षित होने लगते हैं। पुष्पांजिल आज पत्नी, मां और बहू के धर्म का निर्वाह करते हुए समाज सेवा की डगर पर चलने वाली खास शख्सियत बन गई हैं। उसके मार्गदर्शन से हताश, निराश, बीमार और लाचार लोगों को नई रोशनी,  नई ऊर्जा मिलती है। सच कहें तो काशी की यह बहुरिया आज दुखियारी बेटियों की मशाल है।

बकौल पुष्पांजलि उस दिन सासू मां का प्यार जन्मदात्री माता से कहीं ज्यादा दिल की गहराइयों में नरम थपकी की मानिंद महसूस हुआ था। सासू मां ने विवाह से पहले जो कहा था उसे चरितार्थ भी किया। मुझे लगा ही नहीं कि मैं ससुराल में हूं। यद्यपि कुछ लोगों ने विरोध के स्वर भी मुखरित किए लेकिन हमारी सासू मां हमेशा मेरे साथ खड़ी रहीं। उन्होंने मेरे उच्च शिक्षा का रास्ता सुगम किया। देर रात तक पढ़ाई के दौरान चुपके से किचन में चली जातीं और चाय बनाकर पहुंचा देतीं। सिर पर हाथ फेरते हुए कहतीं- बहुत देर हो गई है बेटा, अब सो जाओ। सासू मां की ममताभरी छांव ने पुष्पांजलि को संवेदनाओं की ऐसी थाती दी कि उसे वह पल-पल सहेजती हैं। हर पक्ष, हर स्तर पर न्याय करती हैं।

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पुष्पांजलि को जैतपुरा स्थित नारी संरक्षण गृह और रामनगर स्थित बाल सुधार गृह के रहवासियों की मनोदशा के बारे में जब पता चला तब उन्होंने वहां अपने खर्चे पर कैम्प लगाना शुरू किया। प्रशासनिक अनुमति से वहां लड़कियों, बच्चों में नकारात्मकता के बादल छांटने के लिए योगाभ्यास और मोटीवेशन क्लासेज चालू कीं। यही नहीं स्वावलम्बन के लिए प्रोफेशनल कोर्स की सम्भावनाओं को भी साकार किया। कुछ ही महीनों में नारी संरक्षण गृह की लड़कियों ने अपने कल से तौबा कर आज की सुखद राह थाम ली। कुछ ने कुटीर उद्योग के गुर सीख लिये तो एक-दो ऐसी भी थीं जिन्होंने नर्स की ट्रेनिंग लेकर बीमारों की सेवा शुरू कर दी। पुष्पांजलि के इस सकारात्मक अभियान की चर्चा पूरे देश में ही नहीं विदेशों में भी होने लगी है। पिछले दिनों वर्ल्ड बाडी बिल्डिंग और फिटनेस स्पोर्ट्स फाउंडेशन के जनरल सेक्रेटरी डी. पाल चुआ ने पुष्पांजलि को फिटनेस के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान और महिलाओं के सामाजिक उत्थान के बेहतरीन काम करने के लिए रजत पदक प्रदान किया।

घर में अवस्थागत व्याधियों से पीड़ित ससुर की देखरेख, दो बच्चों के करियर की चिन्ता और पति का ख्याल, यह सब पूरी शिद्दत से निबाहते हुए आज पुष्पांजलि ग्रामीण महिलाओं की सेहत, शिक्षा और स्वावलम्बन के लिए समर्पित हैं। पुष्पांजलि ने बताया कि किसी ने राह सुझाई कि योग और फिटनेस के नियम से तन-मन को स्वस्थ बनाया जा सकता है। नियम, अनुशासन और निरंतरता से स्वस्थ जीवन का निर्माण किया जा सकता है। फिर क्या था मैंने योग और फिटनेस के प्रमुख कोर्स पूरे मनोयोग से पूरे किए। केरल के योग आश्रम में गुरुकुल पद्धति से मिली शिक्षा को आत्मसात किया। आधुनिक फिटनेस कोर्स के लिए महानगरों में शिक्षार्थी बनीं। अनुभव के लिए वहीं कई प्रतिष्ठित जिमों में फिटनेस ट्रेनर के रूप में नौकरी की और जब वाराणसी लौटीं तो धन्वंतरि, चरक की नगरी को प्राचीन योग और स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक नए अवतार का आभास हुआ। अपने क्षेत्र में वर्षों-वर्षों से एकाधिकार रखने वालों के लिए पुष्पांजलि की दक्षता जलन का कारण भी बनी लेकिन जिद्दी और दृढ़ निश्चयी पुष्पांजलि ने हार नहीं मानी बल्कि पूर्ण मनोयोग से उसे कुछ दिनों में ही अलग पहचान दे दी। पुष्पांजलि ने अपनी इस विधा को कभी कमाई का साधन नहीं बनाया बल्कि इसे उन्होंने जरूरतमंद, गरीबों, असहायों की मदद के रूप में ही इस्तेमाल कर रही हैं।

पुष्पांजलि ने बनारस के आदर्श गांव आयर की लड़कियों में शिक्षा और सेहत की अलख जगाई। जिनके घर वाले कभी स्कूल जाने की बात कहने पर खीझ जाते थे, वहां हर घर से लड़कियां पास के स्कूल में नियमित पढ़ाई करने जाती हैं। इन लड़कियों ने सुबह योगाभ्यास का अपना रूटीन बना लिया है। इस दौरान गांव की विवाहिताएं और बुजुर्ग महिलाएं भी योग करने आती हैं। गांव की दलित बस्ती में योग ने सोच और शिक्षा का अलग माहौल बना दिया है। इस गांव की कुछ लड़कियों ने पुष्पांजलि की पहल पर जूडो-कराटे और स्वयं सुरक्षा के गुर भी सीख लिये हैं। पुष्पांजलि ने उन बच्चों के लिए भी अलग-अलग समय में शिविर लगाए जो अपने माता-पिता के साथ कूड़ा बीनकर जीवन यापन करते हैं। उन्हें पढ़ाई की तरफ प्रेरित किया। यह एक जटिल काम था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आज की तारीख में दर्जनों ऐसे बच्चे हैं जो सुबह-शाम माता-पिता के साथ कूड़ा बीनते हैं लेकिन दोपहर में पास के ही सरकारी स्कूल में पढ़ाई करने भी जाते हैं। इन बच्चों के लिए कापी, किताब, ड्रेस, फीस का इंतजाम खुद पुष्पांजलि शर्मा कराती हैं। उन्हें कैसे सरकारी मदद मिले, इसके लिए भी वह प्रयास करती हैं।

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