एक सकंल्प के कारण इन दो गांवों के लोग एक-दूसरे के यहां नहीं पीते पानी,पीढ़ियों की परम्‍परा, जानें पूरा मामला

उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर के दो गांवों में पुरखों की अदावत पीढ़ियों बाद भी चली आ रही है। पिरैला गांव के ब्राह्मण और महादेव घुरहू गांव के कायस्थ बिरादरी पुरखों में छोटे-से विवाद को लेकर जो गांठ पड़ी,जमाने बाद भी नहीं सुलझी। यहां दोनों गांवों के लोग एक-दूसरे के यहां का पानी नहीं पीते। वजह पुरखों का शाप बताया जाता है, जिसके डर से पीढ़ियां-दर-पीढ़ियां उनका आदेश मानती आ रही हैं।

आज से करीब दो सौ-ढाई सौ वर्ष पहले सिद्धार्थनगर जिले की इटवा तहसील के महादेव घुरहू गांव की जमींदारी कायस्थ बिरादरी के पास जमींदार अग्निलाल श्रीवास्तव की क्षेत्र-जवार में तूती बोलती थी। बताते हैं, कि आषाढ़ महीना में पिरैला गांव के ब्राह्मणों के चरवाहे महादेव घुरहू गांव के पास गाय चरा रहे थे। इस दौरान गायों का झुंड जमींदार गइन लाल श्रीवास्तव के धान के खेत में चले गये। इसको लेकर चरवाहों और जमींदार के सिलवारों के बीच कहासुनी होने लगी। बात बिगड़ी और नौबत कायस्थ और ब्राह्मणों के बीच जंग की आ गई। दोनों वर्गों में विवाद शुरू हो गया। इस दौरान जमींदार ने पिरैला गांव के बृजलाल पाण्डेय को कुछ ऐसा व्यंग्य बोल दिया, जो उन्हें चुभ गया।

उसके बाद बृजलाल गांव लौट आए और ब्राह्मण परिवारों को महादेव घुरहू गांव में पानी न पीने का संकल्प दिलाया। साथ ही शाप दिया कि अगर आज के बाद पिरैला गांव का कोई भी ब्राह्मण महादेव घुरहू गांव के कायस्थों के यहां और महादेव घुरहू गांव के कायस्थ ने पिरैला गांव के ब्राह्मणों के घर पानी पीया तो वह विक्षिप्त हो जाएगा। इसके बाद बृजलाल ने अपने प्राण त्याग दिए थे। तभी से इन दोनों गांवों के लोग एक-दूसरे के यहां पानी नहीं पीते हैं। उक्त दोनों गांवों में से एक पिरैला उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय का भी गांव है। वह बताते हैं कि 200 से 250 वर्ष से अधिक पुराना विवाद है। तभी से दोनों गांवों के लोग एक-दूसरे के यहां पानी नहीं पीते हैं। बाकी आना-जाना कायम है।

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पुरखों के द्वारा बनाए इस परंपरा को किसी ने तोड़ा तो दिक्कत में पड़ सकता है। इसलिए दोनों गांवों के लोग इसे निभा रहे हैं। कहा जाता है कि, बाबा के शाप से जमींदार व उनके परिवार को काफी कष्ट हुआ था। अबूझ बीमारी में उनका पूरा परिवार समाप्त हो गया था। इसलिए बाबा के शाप को सिर माथे लगाकर हम लोग उस परम्परा का पालन करते आ रहे हैं।

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