यूपी चुनाव 2017 में बीजेपी खूब माथापच्ची के बाद भी 150 सीटों पर तय नहीं कर पाई प्रत्याशियों के नाम

उत्तर प्रदेश में इस वर्ष होने वाले चुनावों की तैयारी काफी पहले से ही पार्टियों ने शुरू कर दी थी. लगभग सभी दलों ने काफी गुणा-भाग के बाद प्रत्याशियों की सूची जारी भी कर दी. लेकिन, कुछ प्रमुख दल एक-दूसरे के प्रत्याशियों को देखने और फिर नए समीकरणों के हिसाब से अपने प्रत्याशियों के नाम तय करने में लगे रहे हैं. यूपी की 403 विधानसभा सीटों के लिए अब तक बीएसपी के अलावा कोई भी अन्य बड़ा दल अपने प्रत्याशियों को फाइनल नहीं कर पाया है. ऐसा ही हाल भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का है. पार्टी राज्य में 14 सालों से सत्ता से बाहर है और पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सहारे इस बार सत्ता में पहुंचने की उम्मीद लगाए बैठी है.

पार्टी के वरिष्ठ नेता, जो काफी समय से उत्तर प्रदेश के मामलों के देख रहे हैं, ने कहा कि चुनाव से पहले हमारे पास कम से कम 150 सीटों पर सही उम्मीदवार नहीं हैं. दूसरे दलों के स्थापित और परखे हुए प्रत्याशियों को लेना एक कारगर उपाय सा दिखाई दिया है. सूत्रों का कहना है कि यही कारण है कि दूसरे दलों से आए करीब 50 नेताओं को पार्टी ने अभी तक जारी प्रत्याशियों की सूची में टिकट देने की घोषणा की है. राज्य में 403 सीटों में से बीजेपी 371 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और बाकी सीटों पर पार्टी के सहयोगी दलों के प्रत्याशी चुनावी मैदान में होंगे. यह अलग बात है कि पार्टी के ऐसे फैसले से सालों से पार्टी से जुड़े और पार्टी के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं और अन्य नेताओं में गुस्सा है.

जानकारी के अनुसार पिछले काफी समय से पार्टी की ओर से हर सीट पर जिताऊ प्रत्याशी के लिए सर्वे कराया गया. लेकिन अब भी पार्टी राज्य की करीब 150 सीटों पर प्रत्याशियों को अंतिम रूप नहीं दे पाई है. लंबे समय से इस पर काफी दिमाग लगाने के बाद पार्टी के यह समझ में आ गया है कि सही उम्मीदवार का चयन ही सबसे मुश्किल काम है.

पार्टी सूत्रों का कहना है कि इस सबका कारण भी यह है कि पार्टी में पहले ऊंची जाति वालों का बोलबाला रहा है. ऊंचि जाति वालों को ही पहले ज्यादा टिकट दिए जाते रहे हैं. जो बच जाता था वह अन्य लोगों को दिया जाता था. लेकिन अब सब बदल गया है. बीजेपी को अपने पुराने वोट बैंक को भी बरकारार और नए समुदाय के लोगों को भी जोड़ना है जिनकी संख्या काफी ज्यादा है.

2014 के आम चुनाव में बीजेपी ने राज्य की 80 में से 71 सीटों पर विजय हासिल की थी क्योंकि गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ा वर्ग ने पार्टी के लिए वोट किया था. इन जातियों के लोगों को पार्टी के समर्थन में बनाए रखने के लिए पार्टी ने 40 फीसदी सीटों पर इन्हीं जातियों में से नेताओं को उतारा है. पार्टी ने 22 प्रतिशत सीटों पर ब्राह्मण और उच्च जातियों के प्रत्याशियों को टिकट दिया है जबकि 18 सीटों पर बनिया या व्यापारी समुदाय के लोगों को टिकट दिया है. इस बार यह समुदाय जीएसटी और नोटबंदी की वजह से पार्टी से थोड़ा नाराज़ है, लेकिन यह हमेशा से पार्टी के साथ रहा है.

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बीजेपी सूत्रों का कहना है कि पार्टी को किसी भी एक समुदाय का पूरा समर्थन हैं जैसे कि समाजवादी पार्टी को यादवों का और मायावती को दलित समुदाय के एक बड़े हिस्से का समर्थन है. बीजेपी अभी तक अन्य पार्टियों से नाराज़ लोगों और अपनी भावनात्मक अपील का सहारा लेती है और इसी के सहारे यादव-मुस्लिम और दलित-मुस्लिम जैसे ताकतवर गठजोड़ से लोहा लिया है.

राज्य में भले ही बीजेपी 2014 के करिश्मे को दोहराते हुए सत्ता में वापसी करना चाहती है लेकिन पार्टी के नेता यह मान रहे हैं कि विधानसभा चुनाव पूरी तरह से अलग होता है. पार्टी सूत्रों का कहना है कि 2014 मोदी लहर थी और कई नए नेता भी चुनाव जीत गए. इस समय लोग कांग्रेस से पूरी तरह नाराज भी थे. इन विधानसभा चुनाव में हमें लोकसभा चुनाव के मुकाबले 5 गुणा प्रत्याशियों की दरकार है, और इस समय कोई लहर नहीं है और यही वजह है कि पार्टी टिकट न मिलने से नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को शांत करने का प्रयास कर रही है.

उल्लेखनीय है कि राज्य में सात चरणों में चुनाव होने हैं जो 11 फरवरी से प्रारंभ हो रहे है और 11 मार्च को चुनावों का परिणाम आएगा.

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