तो इसलिये भाजपा को पहली बार मिली बुंदेलखंड में ऐतिहासिक चुनावी कामयाबी

गिनती  के सिर्फ पांच अक्षर। लेकिन, इसका नाम लेते ही आपकी आॅखों के सामने एक ऐसे इलाके की तस्वीर आ जाती है, जो हर तरह से बदहाल और तबाह है। कुछ कुदरत ने ऐसा किया। कुछ इंसान ने। सदियों से यह पूरा इलाका इसीलिये अभिशप्त होता चला आ रहा है। हर तरफ सूखा। हर दूसरे या तीसरे साल भयंकर सूखे की चपेट में आकर जल से बाहर निकली मछली की तरह भूख और प्यास से तडपते लोग।  इसीे आपदा से संत्रस्त यहां का किसान आत्महत्या करने अथवा रोजी रोटी की तलाश मे पलायन करने के लिये मजबूर होता चला आ रहा है। साल दर साल। यही बन चुकी है इस भूखंड की भाग्यरेखा अथवा नियति।

बुंदेलखंड की जिस चट्टानी और ऊबडखाबड भूमि पर कभी बसपा का परचम फहराया करता था। वहीं के पिछडे वर्ग के एकमुश्त वोट सहित बसपा सुप्रीमों मायावती का दलित वोट भी छिटक कर भाजपा के ही पाले में आ गया। इसे वोटबैंक को अपनी बपौती समझने वाली मायावती हक्काबक्का रह गयीं। इनकी सरकारों में हुए एक से बढकर एक तरह तरह के  कारनामें ही राह के नुकीले कांटे बन गये। दूसरी ओर, सत्ता में रहते हुए अखिलेश यादव का प्रचण्ड दंभ और सियासी नासमझ ही उन्हें लील ले गयी। कांग्रेस के राजकुमार का जेठ की तपती दुपहरी में झांसी के कमिश्नर के बंगले के पास सडक पर बैठकर सत्याग्रह करना और दलित की झोपडी में रोटी तोडना भी काम न आया।

लेकिन, इस भयंकर बदहाली में भी भाजपा ने पिछले विधान सभाई चुनाव में बुंदेलखंड की पथरीली धरती में भी हर जगह कमल खिला दिया। झांसी, ललितपुर, बांदा, महोबा, हमीरपुर, जालौन और चित्रकूट जिलों की सभी 19 विधान सभाई सीटों को अपनी झोली में डालकर उसने अपनी अभूतपूर्व और ऐतिहासिक राजनीतिक कामयाबी का एक नया इतिहास ही रच दिया।

जानते हैं क्यों? कुछ ही दिनों पहले  लखनऊ  इसकी वजह पर रोशनी डाल गये थे। चर्चा का मुख्य विंदु रहा सूखाग्रस्त बुंदेलखंड की दयनीय दशा। इसी में महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त लातूर और बुंदेलखंड में भी बूंद बूंद पानी के लिये तरसते लोगों के लिये प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भेजी गयी वाटरट्रेन का भी संदर्भ आ गया आ गया था। उसी क्षण इस संवाददाता ने इस प्रकरण की तह में जाने का मन बना लिया था। कल ही बुंदेलखंड से होकर लौटा हॅू। वहां के लोगों की दुखती रगों पर हाथ रखने के बाद उसे लगा कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और उत्त्र प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री अखिलेश यादव की सियासी समझ में यही सबसे बडा बुनियादी फर्क है।  शायद, यही वजह है कि आम आदमी आज भी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को दंभरहित लोकसेवक ही समझता है। वह अपनी माँ को इष्टदेवी दुर्गा की तरह पूजते चले आ रहे हैं। इसीलिये राजसत्ता खुद ही उनके पीछे भाग रही है।

अब आते हैं अपने मुख्य वदु पर। याद कीजिये उस दौर को, जब कुछ ही समय पहले महाराष्ट्र के लातूर जिले में भयानक अकाल पडा था। लोग बूंद बॅूद पानी को तरस रहे थे। यही स्थिति उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र की भी थी। लगातार दो तीन सालों से फसल चैपट हो जाते रहने से कर्ज के बोझ से दबे किसान आत्महत्या कर रहे थे। भूख और प्यास से आकुल-व्याकुल लोग रोजीरोटी की तलाश में पलायन करने को मजबूर थे।

दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री पद का राजसुख भोग चुके अखिलेश यादव हैं, जो एक बार फिर इसी राजसुख को भोगने के लिये इस हद तक विकल हैं कि दतिया में माँ बगलामुखी मंदिर से लेकर अब तक न जाने कहाँ कहाँ माथा टेकते हुए भटक रहे हैं। अपनी इसी समझ और करनी से बेचारे बना दिये गये अखिलेश यादव आज सडक पर हैं। इसके बावजूद आज भी राजदंभ से इस सीमा तक पीडित हैं कि सच को सच मानने के लिये तैयार नहीं। इसी के चलते सियासत में फर्श से अर्श पर पहुंचा देने वाले अपने बाप मुलायम सिंह यादव के भी वह सगे नहीं हुए। फिर किसके होंगे? उनकी राजनीतिक दुगर्ति करने में उन्होंने कोई भी कसर बाकी नहीं रखी। हे राम!

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इस भयंकर दुर्दिन में एक ऐसा भी शख्स रहा है, जिसने प्यासे लातूर के लिये 25 लाख लीटर पानी से भरी एक पूरी ट्रेन ही भेजवाने की व्यवस्था कर दी थी। उस पानी से लातूर के कितन लोंगों की प्यास बुझ सकी या इसके बाद दूसरी बार भी क्या ऐसी कोई वाटरट्रेन वहां भेजी गयी थी? यह एक अलग सवाल है। उसी शख्स ने ऐसी ही एक वाटरटेन बुंदंलखंड के लिये भेजने की व्यवस्था की थी। लेकिन, सूबे के तत्कालीन वजीरेआला रहे अखिलेश यादव इसे एक सियासी हथकंडा से ज्यादा और कुछ भी नहीं समझ सके। इसीलिये उनकी सरकार ने यह कहते हुए इस वाटरट्रेन को लेने से साफ मना कर दिया था कि उसे पानी की बजाय दस हजार टैंकर चाहिये। पानी तो उसके पास वैसे ही बडी प्रचुर मात्रा में हैं।

बेशक, यह इसी सियासी सोच और समझ का ही नतीजा है कि कभी इसी बंुदेलखंड की जिस पथरीलीे, चट्टानी और ऊबडखाबड भूमि पर बसपा का परचम फहराया करता था। वहीं आज झांसी से लेकर ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, बांदा, महोबा और चित्रकूट सहित सातों जिलों की सभी 19 सीटें भाजपा की झोली में आ गयी हैं। इसी सोच की ही बदौलत पिछडे वर्ग का एकमुश्त और मायावती का दलित वोट भी छिटक कर भाजपा के पाले में आ गया है। क्या आप इसे मोदी का सियासी करिश्मा नहीं कहना चाहेंगे?

आप इसे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की सकारात्मक सोच अथवा इंसानियत समझें या न भी समझें। यह आपका अधिकार है। इससे मोदी की सेहत पर असर पडने वाला नहीं हैं। लेकिन, इसके पीछे नरेंद्र मोदी की अद्भुत सियासी सूझ का लोहा तो आपको मानना ही पडेगा। सिर्फ एक वाटरट्रेन ही भेजकर मोदी प्यासे लातुर के जन मन में इस हद तक छा गये कि कुछ ही समय पहले महाराष्ट्र में हुए स्थानीय निकाय के चुनावों में भाजपा को इसी लातूर में ऐतिहासिक कामयाबी मिल गयी। अपनी इसी सोच और सकारात्मक सोच की ही बदौलत उन्होंने सूखाग्रस्त बुंदंलखंड के लोगों का भी विश्वास और भरोसा इस हद तक जीत लिया है कि इस पूरे चट्टानी इलाके में हर तरफ कमल का फूल ही खिल गया। यह मोदी ही हैं, जो राजनीति में अपनी पार्टी को आगे बढाने के लिये दूसरे  राजनीतिक दल की लाइन को काटकर उसे छोटा करने की कोशिश कभी नहीं करते है। इसकी बजाय वह अपनी ही राजनीतिक रेखा को बढाने की कोशिश करते रहे है। इन दिनों उनका यही फार्मूला कश्मीर में भी लागू हो रहा है। क्या आज के भारत में आपको ऐसी राजनीतिक सोच और समझवाले नरेंद्र मोदी की तरह समूचे विपक्ष में दूसरा कोईराजनेता मिल सकेगा?

उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की इसी सोच के कायल हैं। वह सार्वजनिक रूप से इसे स्वीकार भी कर चुके हैं। इसीलिये मोदी की इसी राजनीतिक धरोहर और उनके द्वारा स्थापित इस राजनीतिक परंपर पर चलने और उसे आगे बढाने के लिये वह कृतसंकल्प हैं। इसी के मद्देनजर, कुछ ही दिनों पहले बुंदेलखंड के झांसी जिला में जाकर उन्होंने लोगों की दुखती रगों पर हाथ रखा था। उनके लिये पेयजल की तात्कालिक व्यवस्था खातिर वह 47 करोड रु भी दे आये  थे।

लेकिन, इससे भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह रही कि सिर्फ दो साल के अंदर ही वह समूचे बुंदेलखंड को खुशहाल और समृद्ध बनाने का भरोसा भी दे आये हैं। असंभव को संभव बनाने जैसा एलान। लेकिन, योगी जैसी सख्सियत के लिये तो असंभव कुछ भी नहीं। बस इरादा मजबूत , नेक और सत्ता में रहकर भी विदेहराज जनक जैसा बने रहने का ही होना चाहिये। बुंदेलखंड के चंदेल राजा इसकी मिसाल बन चुके हैं। तो योगी क्यों नहीं बन सकते?

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