रामनाथ कोविंद को समर्थन देना मायावती की मजबूरी, नही तो लेना पड़ेगा राजनीति से सन्यास

यूपी से बसपा का सफाया देखते हुये मायावती की यह अब बहुत बड़ी मजबूरी है कि किसी भी दशा में प्रदेश के दलितों को यह नही जाहिर कराना चाहती कि वे किसी भी दलित का विरोध करती है।  मातावती की राजनीति उत्तर प्रदेश से ही है और उनका वोट बैंक भी दलितों ही है। यदि प्रदेश के  दलितों की ही उपेक्षा मायावती करने लगी तो वह दिन दूर नही कि क्रिकेट खिलाड़ियों की तरह उन्हें भी राजनीति से संन्यास  लेना पड़े।

दलित वोटबैंक को बचाए रखने की मजबूरी ने बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती के तेवर नरम किए है। सियासी संकट से गुजर रही मायावती को न उगलते बन रहा है और न निगलते। राष्ट्रपति पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को सशर्त समर्थन बसपा सुप्रीमो की राजनीतिक बाध्यता  है। दलित विरोधी होने का ठपा लेने की घबराहट ने मायावती को बैकफुट पर ला दिया। कल तक भाजपा विरोधी मोर्चे की पैरोकारी करने वाली मायावती का कहना है कि विपक्ष  की ओर से कोविंद से अधिक काबिल और लोकप्रिय दलित प्रत्याशी नहीं उतारा गया तो बसपा का रूख सकारात्मक रहेगा। यह तय माना जा रहा है कि मायावती की नज़र में कोविंद से अधिक काबिल और लोकप्रिय दलित नेता,स्वंम मायावती को छोड़ दे तो, विपक्ष के पास नही है।

विपक्ष यदि मायावती के कथनानुसार किसी दलित को साझा उम्मीदवार घोषित करता है, तो भी मायावती इस आधार पर रामनाथ कोविंद को समर्थन देगी की वे उनके अपने उत्तर प्रदेश से है।

बसपा सुप्रीमो ने कोविंद के आरएसएस व भाजपा से जुड़े होने पर भी असहमति जतायी परंतु मायावती ने अपने एतराज जताने के साथ कोविंद के पक्ष में अपना रूख सकारात्मक ही रखा  है। उनका कहना है कि एनडीए प्रत्याशी दलित होने के नाते बसपा का स्टैंड नकारात्मक नहीं हो सकता। उन्होंने भाजपा नेतृत्व को सलाह भी दी कि इस पद के लिए दलित वर्ग से कोई गैर राजनीतिक व्यक्ति को आगे किया जाता तो ज्यादा बेहतर होता।

कोविंद को लेकर बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती का नरम रूख यूं नहीं है। नब्बे के दशक से प्रदेश में दलित वोटों की एकजुटता के सहारे ही चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंची बसपा का ग्राफ तेजी से गिरता जा रहा है। गिरावट वर्ष 2012 से शुरू हुई। वर्ष 2007 में बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा 2012 में मात्र 80 सीटों पर सिमट गयी। गिरते ग्राफ का सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। गत लोकसभा चुनाव में भी बसपा कोई सीट नहीं जीत सकी।

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कोविंद के नाम की घोषणा होने के तीन घंटे के भीतर ही मायावती ने प्रेस को जारी बयान में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह व केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू द्वारा टेलीफोन पर वार्ता का हवाला भी दिया। उन्होंने रामनाथ कोविंद के दलित वर्ग से होने का समर्थन किया उनकी जाति कोरी का जिक्र भी किया। इतना ही कोरी जाति की संख्या पूरे देश में कम होने की बात भी कही।

राज्यसभा भेजे जाने का लालू का तंच उन्हें अच्छी तरह याद है, वे भली भांति जानती है कि लालू ऐसा कुछ करने वाले नही है और वे केवल अपने स्वार्थ की बाते करके लुभाने के प्रयास करते है।

सर्वाधिक मुस्लिम प्रत्याशी उतारने के बाद मुसलमानों के अपेक्षित वोट बसपा को नहीं मिल सके। दलितों के एक वर्ग तक ही सिमटना बसपा के लिए बड़ी चुनौती बना है। दलित वोटों की मची जंग में बसपा का पूरा जोर दलितों में बिखराव रोकने पर लगा है।

विपक्षी दलों के हमलों के अलावा दलितों में भी मायावती का विरोध दिखने लगा है। बसपा से अलग हुए दलित नेताओं का मिशन बचाओ अभियान ने भी मायावती की नींद उड़ा रखी है। सहारनपुर प्रकरण में भीम आर्मी का तेजी उभार और युवाओं में बढ़ती लोकप्रियता भी बसपा के लिए चुनौती बना है। ऐसे हालात में दलित विरोधी का ठपा लगने से बचने को बसपा प्रमुख के सुर बदले है और वे किसी भी कारण सर रामनाथ कोविंद  का विरोध नही करेगी।

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