लखनऊ ने पूरे देश को दी जेठ के मंगल पूजने की परम्परा, नवाब ने कराई थी शुरुआत

लखनऊ। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने अपने प्रिय छोटे भाई लक्ष्मण जी के लिए लक्ष्मणपुरी का निर्माण करवाया था। इस नगर को अब लखनऊ के नाम से जाना जाता है। लक्ष्मण जी के इस नगरी में आने के साक्ष्य बुद्धेश्वर महादेव मंदिर में भी मिलते हैं। मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी इस नगरी में कुछ समय बिताया। लखनऊ में जेठ महीने में श्रीराम के अनन्य भक्त हनुमान के पूजन की समृद्ध परंपरा है। शहर में दर्जनों की संख्या में प्राचीन मंदिर हैं, जहां हनुमान भक्तों की भीड़ उमड़ती है। इस साल कोरोना संक्रमण के चलते लागू लॉकडाउन में मंदिरों में भक्तों के जानें पर पाबंदी रहेगी। ऐसे में लोग अपने घरों में रहकर भक्त शिरोमणि हनुमान जी की आराधना करेंगे।

शहर के इन मंदिरों में उमड़ती थी भीड़

अलीगंज के नए हनुमान मन्दिर की करें तो वह करीब ढाई सौ वर्ष पुराना है। अलीगंज का नया हनुमान मन्दिर को बेगम के सिपहसालार जठमल ने बनवाया था। यहां पर हुई खुदाई में निकली मूर्तियों को हाथी पर रखकर इमामबाड़े के पास नए मन्दिर में स्थापित करने के लिए ले जाया जा रहा था। लेकिन हाथी यही पर रूक गया। काफी कोशिश की लेकिन हाथी उठा नही। बाद में साधू संतों ने बेगम को बताया कि गोमतीपार का क्षेत्र लक्ष्मण जी का है। यहां से हनुमान जी जाना नही चाहते है। फिर मूर्तियों को यही पर स्थापित किया गया। बाद में महमूदाबाद के राजा ने मन्दिर के लिए जमीन दी जहां पर आज तक मेला लगता आ रहा है।

वहीं, 1960 की बाढ़ में बाबा नीम करौरी आश्रम स्थित हनुमान मन्दिर मे बजरंगबली की मूर्ति छोड़कर बाकी सब बह गए। जिसे भूमि अधिग्रहीत कर दोबारा स्थापित कराया गया। जिसमें बाबा की दूरदर्शिता का पुट नजर आता है। बाबा ने मूर्ति का मुख्य सड़क की ओर कराया जिससे आने वाले भक्तों को आसानी से दर्शन हो सके।

Gyan Dairy

पुराने शहर में मेडिकल कालेज के पास स्थित छाछी कुआ हनुमान मन्दिर में 1884 के आस पास एक बारात इस मन्दिर में रुकी थी बारातियों के जलपान के लिए जब महंत के शिष्य ने कुएं में बाल्टी डाली तो पानी की जगह छाछ निकली। जिसके बाद से इस मन्दिर का नाम छाछी कुआ पड़ गया। इसी कुएं से एक बजरंगबली की प्रतिमा भी निकली थी। मन्दिर की स्थापना महंत बाबा परमेश्वर दास ने कराई थी।

लखनऊ के नवाब ने शुरू की परम्परा
दरअसल नवाब सआदत अली की मां छतर कुंवर ने अपने बेट के स्वास्थ्य के लिए अलीगंज के पुराने हनुमान मंदिर में दुआ मांगी थी इसलिए उस मंदिर में जेठ महीने में मेले और पूजा की परंपरा शुरू हुई जो आज तक जारी है। लोगों की मान्यता बढ़ती गई और आज देश विदेश तक जेठ का बड़ा मंगल मनाया जाने लगा है। उस ऐतिहासिक घटना की गवाही देता चांद आज भी मंदिर के ऊपर लगा है। वहां खासतौरसे भुने गेहूं का प्रसाद गुड़धनिया बाटने की परंपरा भी जीवित है।

Share