शिवपाल यादव ही नहीं बल्कि योगी आदित्यनाथ भी चाहते हैं कि ईश्वर अखिलेश यादव को सद्बुद्धि प्रदान करे

सियासत में लगातार कमजोर और अलग थलग पडते जा रहे निवर्तमान मुख्य मंत्री अखिलेश यादव के पास क्या वास्तव में बुद्धि का टोटा हो गया है? पता नहीं, सूबे का प्रबुद्ध वर्ग इस बारे में क्या सोचता है? लेकिन, पिछले कुछ समय से उनके बात और काम करने के अंदाज को देखते हुए अब कुछ लोगों को इस बात का एहसास होने लगा है कि पिता मुलायम सिंह यादव के प्रति दिखाई गयी उनकी उदारता और सौजन्य को देखने के बाद यह कहना गलत नहीं होगा कि अखिलेश यादव अब पहले जैसे नहीं रह गये हैं। उनकी सियासी सोच में बदलाव आता जा रहा है। हो सकता है कि इसकी असल वजह उनमें उपज रही हताशा अथवा कुंठा हो।

लगता है कि अब मुख्य मत्री योगी आदित्य नाक को भी इस बात का अच्छी तरह एहसास हो गया है कि अखिलेश यादव को सद्बुद्धि की बडी सख्त जरूरत है। भले ही यह कहकर उन्होंने अखिलेश यादव पर बडा गहरा तंज कसा हो। लेकिन, उनका यह तंज भी अनर्गल नही कहा जा सकता है। उसमें दम है।

सपा के एमएलसी पद को छोडने वाले बुक्कल नवाब को सुनकर भी कुछ ऐसा ही लगा। इन्हें अखिलेश यादव का बहुत करीबी माना जाता रहा है। इनका कहना है कि पार्टी में बिखराव आने के बाद वह अंदर ही अंदर बहुत घुटन महसूस कर रहे थे। कुछ ऐसा ही सपा छोडने वाले सपा के दूसरे एमएलसी के बारे में भी कहा जा रहा है। इससे लगता है कि निकट भविष्य में ही सपा के दूसरे तमाम प्रभावशाली नेता भी अखिलेश यादव से किनाराकशी करने जा रहे हैं। ऐसे में क्या अखिलेश यादव को अब एकला चलों की राह पर चलना पडेगा? आने वाले कुछ ही दिनों में ही इसकी सटीक जानकारी मिल सकेगी।

भारत के एक दुश्मन देश को इस तरह महिमा मंडित करने के लिये अखिलेश यादव के दिये गये इस बयान पर योगी की ही तरह हर राष्ट्रभक्त भारतीय को गहरी आपत्ति और दुख हो सकता है। योगी का यह भी कहना रहा है कि यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है और इस पर रोक लगनी ही चाहिये। फिलहाल, उन्होंने अखिलेश यादव को सद्बुद्धि  देने की ईश्वर से प्रार्थना की है।

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xसलन, मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ का विधान परिषद में बजट पर सामान्य चर्चा का जवाब देते हुए यह कहना तर्कसंगत लगता है कि अखिलेश यादव को चीन को महिमा मंडित करने की क्या जरूरत थी? वह भी ऐसे वक्त पर जब दोनों ही देश बडी तनावपूर्ण स्थिति से गुजर रहे हों। इस मुद्दे पर अखिलेश यादव का विधान परिषद में कहना रहा है कि- हम तो जानते हैं कि लडाई उसी से करो, जिससे जीत जाओ। चीन से थोडा संभलकर। भारत वर्ष 1962 वाला भारत नहीं रह गया है। यह क्यों नहीं जानते कि चीन वह नहीं रह गया है, जो 1962 में था। वहां पर जो तरक्की और मूलभूत ढांचे की चीजें हैं, हम उसके पास नहीं पहुंच सकते।

कुछ ऐसी ही अपेक्षा अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव ने भी की है। उनकी भी चाहत है कि अखिलेश को इतनी सद्बुद्धि जा जाय कि वह अपने पिता मुलायम सिंह यादव को सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद उन्हें बिना देर किये ससम्मान वापस कर दें। इसी में उनकी और पूरे परिवार की भलाई है। लेकिन, उन्होंने यह चेतावनी भी दी है कि यदि ऐसा नहीं किया गया, तो वह नेताजी के नेतृत्व में सेक्युलर विचारधारा वाले लोगों की एक नयी राजनीतिक पार्टी का गठन कर लेंगे।

 

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