लव जिहाद कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने यूपी-उत्तराखंड सरकार को भेजा नोटिस, जाने क्यों

नई दिल्ली। जबसे उत्तर प्रदेश में लव जिहाद कानून लागू हुआ है तभी से इसका विरोध भी शुरू हो गया है। लेकिन उत्तर प्रदेश लव जिहाद से जुड़े अध्यादेश के मसले पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, सर्वोच्च अदालत ने इस अध्यादेश पर फिलहाल रोक लगाने से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही कानूनों की वैधता की जांच उच्चतम न्यायालय द्वारा की जाएगी।

सीजेआई एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों वाली पीठ ने अध्यादेश और कानूनों की वैधता की जांच करने पर सहमति व्यक्त की। बेंच में जस्टिस एएस बोपन्ना और वी रामासुब्रमण्यन शामिल हैं, जिन्होंने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश सरकारों को नोटिस जारी किए। राज्यों के पास अगली सुनवाई से पहले जवाब देने के लिए चार सप्ताह का समय है।

शीर्ष अदालत उत्तराखंड फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट, 2018 और उत्तर प्रदेश निषेध धर्म परिवर्तन, 2020 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जो धार्मिक रूपांतरण और दूसरे धर्म में विवाह को रोकते हैं।

दिल्ली के एक वकील और मुंबई स्थित सिटिजन फॉर जस्टिस एंड पीस (ब्श्रच्) द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि अध्यादेश और कानून अनुच्छेद 21 और 25 का उल्लंघन है, क्योंकि यह राज्य को एक व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और दमन का अधिकार देता है, जिसमें उसे किसी भी पसंद का धर्म निभाने की आजादी।

प्रारंभ में अदालत इस मुद्दे की जांच करने के लिए अनिच्छुक थी और याचिकाकर्ताओं से उच्च न्यायालयों से संपर्क करने को कहा। भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने कहा, श्इलाहाबाद और उत्तराखंड उच्च न्यायालयों के सामने अपील लंबित है। आप वहां क्यों नहीं जा सकते?श्

जवाब में वरिष्ठ वकील सीयू सिंह ने कहा कि इस मामले को शीर्ष अदालत द्वारा देखा जाना चाहिए, क्योंकि कई राज्य इन कानूनों को पारित कर रहे हैं।

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मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश ने भी इन कानूनों को पारित किया। सिंह ने तर्क देते हुए कहा कि इस कानून के तहत 10 साल की जेल की अवधि निर्धारित है और आरोपी पर सबूत का बोझ है। कानूनों को बनाए रखने के लिए एक नोटिस की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ प्रावधान ष्भयानकष् हैं और शादी करने के लिए पूर्व अनुमति का खंड सही नहीं है।

एक अन्य याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट इन मामलों की सुनवाई और इसकी जांच के लिए उच्च न्यायालयों को कहर सकता है। याचिका में निजता, पुलिस को अत्यधिक संवैधानिक शक्तियां देने के मुद्दे भी उठाए गए हैं।

चीफ जस्टिस बोबडे ने कहा, हम नोटिस जारी कर रहे हैं, इस मामले को चार सप्ताह बाद सुना जाएगा।

यूपी में जो लोग शादी के बाद धर्मपरिवर्तन की योजना बनाते हैं, उन्हें जिला मजिस्ट्रेट को दो महीने पहले नोटिस देना होगा। परिवर्तित करने वाले व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि उसे शादी के लिए मजबूर नहीं किया गया था। इसके साथ ही सभी मामले गैर-जमानती होंगे। नवंबर में एक कार्यकारी आदेश के बाद राज्य में नए कानून के तहत कई लोगों को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है।

 

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