अफगानिस्तान: तालीबान राज में हजारा समुदाय पर खतरा बढ़ा, अंतरिम सरकार में नहीं मिला प्रतिनिधित्व

काबुल। अफगानिस्तान के इतिहास में जब भी सबसे ज्यादा ज्यादती झेलने वाले समुदायों पर चर्चा होती है तो हजारा समुदाय का नाम सबसे आगे आता है। अफगानिस्तान की कुल आबादी में हजारा समुदाय करीब 10 फीसद है। शिया समुदाय से ताल्लुक रखने वाला हजारा समुदाय हमेशा से तालिबान और इस्लामिक स्टेट के निशाने पर रहा है। तालिबान द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जा किए जाने से हजारा समुदाय को खतरा महसूस हो रहा है।

हजारा समुदाय पहले जुमे की नमाज़ के दौरान इस्लामिक स्टेट के हमलों से डरता था। अब तालिबान सरकार में हज़ारा समुदाय को कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। अफगानिस्तान के तीसरे सबसे बड़े जातीय समूह को सत्ता में भागीदारी न मिलना चिंता का विषय है। तालिबान ने 1990 के दशक के आख़िरी में जिस तरह से हज़ारा लोगों पर हमला किया था, एक बार फिर वैसा ही कर सकता है। हज़ारा समुदाय के लोगों ने अफगानिस्तान के सबसे हिंसक हमलों का सामना किया है। उनकी रैलियों पर धमाके किए गए। हॉस्पिटल और स्कूल उड़ा दिए गए। यात्रियों पर घात लगाकर हमला किया गया है।

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तालिबान की शिया विरोधी जड़ें इतनी गहरी हैं कि वह रातों-रात गायब नहीं हो सकती। अबकी तालिबान अगर अफगानिस्तान के शिया लोगों को मारता है तो ईरान के साथ उसके संबंध बदतर हो सकते हैं। अफगानिस्तान पर शियाओं पर हमले से ईरान के पास न चाहते हुए भी युद्ध की ओर जाना पड़ सकता है और यह इस क्षेत्र के हित में नहीं होगा। हालांकि हज़ारा समुदाय को उम्मीद है कि अंतरिम सरकार के बाद जो स्थायी सरकार बनेगी उसमें हज़ारा समुदाय को उचित प्रतिनिधित्व मिल सकेगा।

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