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अब शरीर में ऐसे मरेगा वायरस, वैज्ञानिकों ने निकाला अनोखा तोड़

अब शरीर में ऐसे मरेगा वायरस, वैज्ञानिकों ने निकाला अनोखा तोड़
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नई दिल्‍ली: कोरोना ने पूरी दुनिया को छका रखा है, न तो कोई दवा काम आ रही है और न ही कोई थैरेपी। ऐसे में अब इंसानी शरीर में ही कोरोना की कब्र खोदने की तैयारी चल रही है। हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम को कोरोना हरा देता है, इसलिए अब हमारी प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाकर उसे मात देने की काम बस पूरा ही होने जा रहा है।

दुनिया में कोरोना की मौत की कहानी के लिए हर जगह प्लॉट तैयार हो रहे हैं, लेकिन कामयाबी नहीं मिल पा रही। वैज्ञानिक मानते हैं कि कोरोना हमारे शरीर को ढाल बनाकर हमारे साथ लुका छिपी करता है। इसलिए उसे बाहर से खोजना और फिर मारना भारी पड़ रह है। ऐसे में अब कोरोना के लिए नया प्लान तैयार हो चुका है। अब शरीर की सुपरपॉवर को जगा कर कोरोना की इसी ढाल को उसकी कब्र बना दिया जाएगा। हमारी प्रतिरोधी क्षमता यूं तो किसी भी बीमारी के खिलाफ खुद को तैयार कर उसे मुकाबला करती है, लेकिन कोरोना का वायरस इतनी तेजी से हमला करता है कि हमारी बॉडी में एंटीवायरस बन ही नहीं पाते। मतलब हमारे शरीर में प्रतिरोधी ताकत बहुत धीमी गति से बनती है। लेकिन किलर कोरोना का हमला बहुत तेज होता है। इसलिए अब हमारे शरीर की प्रतिरोधि क्षमता यानि इम्यूनिटी को हाइपर एक्टिव कर इस युद्ध को जीता जाएगा।

अमेरिका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के रिसर्च से बड़ी उम्मीद बनी है। दुनिया के सबसे भरोसेमंद वैज्ञानिक इस युनिवर्सिटी में एक बड़ा क्लीनिकल ट्रायल चला रहे हैं। यहां कई वॉलेंटियर्स पर एक खास दवा का प्रयोग चल रहा है, जिसका नाम अल्फा-ब्लॉकर्स है। माना जा रहा है कि ये दवा कोरोना के वायरस की तेज गति को टक्कर दे सकती है। मतलब बीमारी के बिगड़ने से पहले ही शरीर को एक्टिव कर उसके प्रभाव को रोक सकती है।

अमेरिका की जॉन हॉफकिन्स युनिवर्सिटी की रिसर्च

अल्फा ब्लॉकर्स दवा से होगा इलाज
वॉलेंटियर्स पर चल रहा है ट्रायल
45 से 85 साल के वॉलेंटियर्स पर ट्रायल
शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को करेगी ‘सुपरएक्टिव’
वायरस का संक्रमण ज्यादा फैलने से पहले असर
श्वसन तंत्र में सूजन और ज्यादा संक्रमण से पहले ही ठीक होगा शरीर
चूहों पर हो चुका है सफल परीक्षण

वैज्ञानिकों को जॉन्स हॉपकिन्स अस्पताल में 45 से 85 वर्ष की आयु के बीच COVID-19 पर चल रहे ट्रायल के लिए वॉलेंटिर्यस की तलाश है। ये वो लोग होंगे जो ज्यादा बीमार न हों। मतलब जो वेंटीलेटर पर या ICU में न हों, क्योंकि इस रिसर्च का मकसद ही कम संक्रमण वाले रोगियों के शरीर में से बीमारी को घातक होने से पहले ही ठीक कर देना है। अल्फा ब्लॉकर्स का इस्तेमाल इम्यून सिस्टम को ओवरएक्टिव कर देता है। ये परखा जा रहा है कि ये दवा शरीर में कोविड-19 से संक्रमण के ज्यादा फैलने से पहले क्या फेफड़े और श्वसन नली की सूजन को रोक सकती है और क्या इस दवा से हमारे प्रतिरोधी क्षमता तेजी से एक्टिव होकर इस संक्रमण से लड़ सकती है।

जिन लोगों पर ये रिर्सच चल रही है उनका इलाज, जिस दवा से किया जा रहा है वो कोई नई दवा नहीं है। अल्फा ब्लॉकर्स से पहले भी इलाज होता रहा है। इसका काम शरीर में संक्रमण ज्यादा फैलने से पहले ही शरीर की इम्यूनिटी को हाइपर एक्टिव कर बीमारी से जीतने के लिए होता है। शरीर में संक्रमण ज्यादा फैले उससे पहले ही शरीर की इम्यूनिटी को सुपर एक्टिव कर उसे बीमारी से लड़ने के लायक बना देता है। चूहों पर इस दवा का सफल परीक्षण हो चुका है। जानकार मानते हैं कि अगर ये दवा असरदार रही तो फिर लोगों को अस्पताल तक आने की जरुरत ही नहीं होगी। संसाधनों का दबाव कम होगा और मौत के आंकड़ों में बेहद कमी आएगी।

शरीर में जब संक्रमण का पहला पता मैक्रोफेज को लगता है
मैक्रोफेज दूसरे प्रोटीनों को पॉलीलाइन के रुप में चेतावनी संदेश भेजते हैं
जिसके बाद हमारे साइटोकिन्स (दूसरी प्रतिरोधी कोशिकाओं यानि) एंटीबॉडीज को पैदा करती हैं
ये हमारे शरीर की सामान्य प्रतिरक्षा प्रणाली है
लेकिन खतरे की सिग्नल भेजने वाले मैक्राफेज दूसरे कैटेकोलामाइन को भी ये संदेश भेज सकते हैं
ये कैटेकोलामाइन एंटीबॉडी को बनाने की इस प्रतिक्रिया और तेज कर देता है
इससे शरीर में और तेजी से एंटीबॉडी बनाने के संकेत तेजी से जेनरेट होते हैं
शरीर हाइपर एक्टिव तरीके से बीमारी के खिलाफ प्रतिरोधी बन जाता है

जिन लोगों पर ट्रायल चल रहे हैं उन पर 60 दिनों के लिए नजर रखी जाएगी। धीरे-धीरे इनके शरीर पर इस दवा की खुराक को बढ़ाया जाएगा। ये भी परखा जाएगा कि उनके साथ और उनके जैसे बीमार हुए लोगों में से क्या ट्रायल वाले मरीजों को वेंटिलेटर और ICU की जरुरत कम पडी। मतलब क्या उनके शरीर ने खुद की ये लड़ाई लड़ ली। इस रिसर्च के शुरुआती नतीजे कुछ ही हफ्तों में आने की उम्मीद है। सबसे बड़ी चुनौती साइड इफेक्ट को लेकर है, इसीलिए बेहद संतुलित तरीके से इस रिसर्च को आगे बढ़ाया जा रहा है।

कोरोना की दवा के लिए पूरी दुनिया में रिसर्च चल रही है। हर कोई अपने अपने तरीके से इंसानियत के दुश्मन इस वायरस की मौत का सामान तैयार कर रहा है। पूरी दुनिया इन रिर्सच पर टकटकी लगाए बैठी है। ऐस में अमेरिका की प्रसिद्ध जॉन हॉफकिन्स युनिर्वसिटी से सबसे ज्यादा उम्मीदें हैं, क्योंकि उनका शानदार इतिहास बताता है कि वो मेडिकल क्रांति के लिए कई बड़े काम कर चुके हैं और कोरोना के लेकर उनका जो डेटा सेंटर है, वो पूरी दुनिया में सबसे अच्छा माना जा रहा है। कोरोना के मामलों की वैश्विक जानकारी के लिए आप में से कई लोगों ने वर्ल्डोमीटर नाम की वेबसाइट का इस्तेमाल किया है, जो इसी जॉन हॉफकिन्स यूनिवर्सटी के डेटा सेटर की खोज है।

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