देवताओं ने भगवान शिव से नहीं होने दी शादी, स्थान का नाम हुआ कन्याकुमारी

नई दिल्ली। भारत के दक्षिणी छोर कन्याकुमारी के बारे में कौन नही जानता। क्या जानते हैं कि तीन समुद्रों से घिरे इस स्थान का नाम कन्याकुमारी कैसे पड़ा? आज हम आपको इस स्थान के नाम की पूरी कहानी बताने जा रहे हैं।

शिवपुराण के अनुसार बानासुरन नाम के एक राक्षस ने देवताओं को पराजित करके देवलोक पर अपना अधिपत्य जमा लिया। कोई देवता इस दानव पर विजय नहीं प्राप्त कर पा रहा था क्योंकि बानासुरन को भगवान शिव का वरदान था कि उसकी मृत्यु केवल एक ‘कुंवारी कन्या’ के हाथों ही हो सकती है। देवताओं की विनय पर राक्षस का वध करने के लिए आदि शक्ति के एक अंश से एक पुत्री का जन्म हुआ। इस पुत्री का जन्म उस समय देश के राजा के घर में हुआ। राजा के आठ पुत्र और एक यही पुत्री थी।

जब यह कन्या किशोरावस्था में पहुंची तो इसे भगवान शिव से प्रेम हुआ और उन्हें पाने के लिए  इसने कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए और शादी का वचन दिया।  तय समय पर भगवान शिव बारात लेकर निकले। इस बीच नारद जी को पता चला कि कन्या का जन्म बानासुरन को मारने के लिए हुआ है। भगवान शिव की कैलाश से आधी रात को बारात निकली ताकि सुबह सही मुहूर्त पर दक्षिणी छोर पहुंच पाएं। यहां सभी देवताओं ने मिलकर इस शादी को रोकने की योजना बनाई। बारात सुबह कन्या के द्वार पहुंचती इससे पहले ही छल करके देवताओं ने रात के अंधेरे में ही मुर्गे की आवाज में बांग लगा दी। ऐसे में भगवान शिव को लगा कि वो सही मुहूर्त पर कन्या के घर नहीं पहुंच पाए और उन्होंने बारात कैलाश की ओर लौटा दी।

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वहीं, असुर बानासुरन को कन्या की सुंदरता के बारे में खबर हुई और शादी का प्रस्ताव भेजा। क्रोध में आई कन्या ने बानासुर से युद्ध लड़ने को कहा, साथ ही कहा कि यदि वो हार जाती हैं तो विवाह कर लेंगी। कन्या का जन्म ही बानासुरन का वध करने के लिए हुआ था। दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ और बानासुरन मारा गया. वहीं, कन्या हमेशा के लिए कुंवारी रह गई। कथा के अनुसार इसी कन्या के नाम पर दक्षिणी छोर का नाम कन्याकुमारी पड़ा।

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