इस गांव में है महादानी कर्ण और दुर्योधन का अनूठा मंदिर, महाभारत से जुड़ा है रहस्य

नई दिल्ली। देवभूमि उत्तराखंड में प्राचीन मंदिरों की भरमार है। यहां की खूबसूरत वाद‍ियों में कई ऐसे अनोखे मंदिर भी है, जिनका संबंध महाभारत काल से है। यहां महाभारत के दुर्योधन और दानवीर कर्ण की भी पूजा होती है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के जखोल में टंस घाटी में दुर्योधन और कर्ण का मंदिर है। दुर्योधन का मंदिर यहां के नेतवार नामक जगह से करीब 12 किमी दूर ‘हर की दून’ रोड पर स्थ‍ित सौर गांव में है। देहरादून से करीब 95 किमी दूर चकराता और चकराता से करीब 69 किमी दूर नेतवार गांव है। जबकि कर्ण मंदिर नेतवार से करीब डेढ़ मील दूर सारनौल गांव में है।

ये द‍ेश का एक मात्र मंदिर है जो कौरव श्रेष्ठ दुर्योधन को समर्पित है। इतिहासकारों का कहना है क‍ि मंदिर के देवता दुर्योधन हैं। हालांकि स्थानीय लोग इसे कौरव मंद‍िर नहीं मानते हैं। दुर्योधन के मंदिर को कुछ साल पहले शिव मंदिर में तब्दील कर दिया गया। इस गांव में अभी भी सोने की परत चढ़ी एक कुल्हाड़ी है जिसे लोग कौरव राजकुमार दुर्योधन की मानते हैं।

आज का कर्ण मंदिर बूढ़ी गंगा के पुल के पास स्थित है। माना जाता है कि, महाभारत काल मे गंगाजी, इसी घाट से होकर गुजरती थीं। गंगा जी का प्रवाह इस स्थान से दूर हो जाने की वजह से, अब इस विलुप्त धारा को बूढ़ी गंगाजी के नाम से जाना जाने लगा है। कर्ण घाट से थोड़ा ही दूर, द्रौपदी घाट को बूढ़ी गंगा पुल के विपरीत दिशा मे देखा जा सकता है।

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मान्यता है कि कर्ण घाट मंदिर पर सूर्यपुत्र दानवीर कर्ण भगवान शिव की पूजा करने के पश्‍चात, सवामन सोना प्रतिदिन दान किया करते थे। मान्यता के अनुसार, उसी स्थान 2012 की दीपावली को शिवलिंग की पुनः स्थापना कर दी गयी है। ऐसा माना जाता है कि पास ही मे एक देवी माँ का मंदिर था। जो कर्ण को सोना दिया करतीं थीं, आज वो मंदिर विलुप्त हो चुका है या धरती मे समा गया है।

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