हैरान करने वालों रहस्यों से भरा है खंडोबा का शिव मंदिर, जानिए दिलचस्प तथ्य

नई दिल्ली। देश के मंदिरों में बहुत सारे ऐसे रहस्य छिपे हैं, जिन्हें आज तक कोई नहीं समझ पाया। ऐसा ही एक प्राचीन मंदिर महाराष्ट्र के पुणे जिले में जेजुरी नामक नगर में स्थित है। इसे खंडोबा मंदिर के नाम से पूरी दुनिया में जाना जाता है। मराठी लोग इसे ‘खंडोबाची जेजुरी’ (खंडोबा की जेजुरी) कहकर पुकारते हैं। इस मंदिर में श्रृद्धालु अपनी भक्ति साबित करने के लिए दांतों से 42 किलोग्राम वजनी तलवार उठाते हैं।

यह मंदिर 718 मीटर (करीब 2,356 फीट) की ऊंचाई पर एक पहाड़ी के मध्य स्थित है। मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब दो सौ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मान्यता है कि मंदिर में दर्शन करने से नि:संतान दम्पतियों और अविवाहित लोगों की मनोकामना पूरी होती है। इस मंदिर को लेकर कई रहस्य कहे जाते हैं, जो आपको हैरान कर देंगे। मंदिर में विराजमान देवता को भगवान खंडोबा कहा जाता है। उन्हें मार्तण्ड भैरव और मल्हारी जैसे अन्य नामों से भी जाना जाता है, जो भगवान शिव का ही दूसरा रूप है। भगवान खंडोबा की मूर्ति घोड़े की सवारी करते एक योद्धा के रूप में है। उनके हाथ में राक्षसों को मारने के लिए कि एक बड़ी सी तलवार है।

खंडोबा मंदिर मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित है। पहला भाग मंडप कहलाता है जबकि दूसरे भाग में गर्भगृह है। गर्भग्रह में भगवान खंडोबा की मनोहारी मूर्ति स्थापित है। हेमाड़पंथी शैली में बने इस मंदिर में पीतल से बना एक बड़ा सा कछुआ भी है। इसके अलावा मंदिर में एतिहासिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण कई हथियार भी रखे गए हैं। दशहरे के दिन यहां भारी भरकम तलवार को दांत के सहारे अधिक वक्त तक उठाए रखने की एक प्रतियोगिता भी होती है, जो बहुत प्रसिद्ध है।

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प्रचलित है यह कहानी
मान्यता है कि प्राचीन काल में मल्ल और मणि नाम के दो राक्षस भाईयों का अत्याचार काफी बढ़ गया था। देवताओं की गुहार पर भगवान शिव ने मार्तंड भैरव का अवतार लिया। भगवान शिव ने युद्ध में मल्ला का सिर काट कर मंदिर की सीढ़ियों पर छोड़ दिया था जबकि मणि ने मानव जाति की भलाई का वरदान भगवान से मांगा था, इसलिए उसे उन्होंने छोड़ दिया। इस पौराणिक कथा का उल्लेख ब्रह्माण्ड पुराण में मिलता है। भगवान खंडोबा को एक उग्र देवता के रूप में माना जाता है, इसलिए इनकी पूजा के नियम बेहद ही कड़े हैं। किसी साधारण पूजा की तरह उन्हें हल्दी और फूल तो चढ़ाया ही जाता है, लेकिन कभी-कभी बकरी का मांस भी मंदिर के बाहर भगवान को चढ़ाया जाता है।

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