इस मंदिर में कमर पर हाथ रखकर खड़े हैं कृष्ण, जानें दिलचस्प तथ्य

नई दिल्ली। महाराष्ट्र के पंढरपुर स्थित प्राचीन विट्ठल मंदिर महाराष्ट्र के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है। महाराष्ट्र के शोलापुर में चन्द्रभागा (भीमा) नदी के तट पर पंढरपुर मन्दिर है जहां श्रीकृष्ण पण्ढरीनाथ, विट्ठल, विठोबा और पांडुरंग के नाम से जाने जाते हैं । वे महाराष्ट्र के संतों के आराध्य हैं। यह महाराष्ट्र का प्रधान तीर्थ है। विट्ठल मंदिर 12 वीं सदी की संरचना है जो भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित करता है , यहां भगवान कमर पर हाथ रखकर खड़े हैं। आइए जानते हैं मंदिर और इस पूजा का महत्व।

आषाढ़ के महीने में यहां श्रद्धालु प्रसिद्ध पंढरपुर यात्रा में भाग लेने पहुंचते हैं। मुख्य मंदिर का निर्माण 12 वीं शताब्दी में देवगिरि के यादव शासकों द्वारा कराया गया था। इस मंदिर में भगवान विट्ठल के साथ देवी रुक्मिणी भी मौजूद हैं। भगवान विट्ठल को विट्ठोबा , श्रीपुण्डरीनाथ और पांडुरंग के नाम से भी जाना जाता है।

श्री विट्ठल मंदिर में श्रीपुण्डरीनाथ कमर पर हाथ रखे खड़े हैं। उन्हें घेरे देवी रुक्मिणी , बलरामजी , सत्यभामा , जाम्बवती तथा श्रीराधा के मंदिर हैं। देवशयनी और देवोत्थान एकादशी को बारकरी संप्रदाय के लोग यात्रा करके भगवान विट्ठल और रुक्मिणी की महापूजा देखने के लिए एकत्रित होते हैं। इस यात्रा को वारीदेना कहते हैं। इस अवसर पर राज्यभर से लोग पैदल ही चलकर मंदिर नगरी पहुंचते हैं।

भगवान विट्ठल यानी श्रीकृष्ण यहां कमर पर हाथ रखकर क्यों खड़े हैं इसके बारे में एक रोचक पौराणिक कहानी मिलती है। बताया जाता है पुण्डरीक नाम का एक हरि भक्त माता – पिता के परम सेवक थे। एक समय वे माता – पिता की सेवा में लगे थे , उस समय श्रीकृष्ण और देवी रुक्मिणी के साथ उन्हें दर्शन देने पधारे। वह अपने माता – पिता के पैर दबाने में इतने लीन थे कि अपने इष्टदेव की ओर उनका ध्यान ही नहीं गया। तब श्रीकृष्ण ने पुण्डरीक को पुकारा।

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संत पुण्डरीक ने भगवान श्रीकृष्ण को ईंट देते हुए कहा , ‘ मेरे पिताजी सो रहे हैं , इसलिए आप इस ईंट पर खड़े होकर प्रतीक्षा कीजिए। ‘ वे पुन : पैर दबाने लग गए। माता – पिता के लिए पुण्डरीक की सेवा – भाव देखकर श्रीकृष्ण प्रसन्न हो गए और दोनों हाथो को कमर पर रखकर उसी ईंट को आसन मानकर खड़े हो गए। सेवा से निवृत्त होने पर पुण्डरीक ने भगवान के इस रूप के दर्शन किए और भगवान से यह वरदान मांगा कि वह इसी रूप में यहां स्थित होकर भक्तों को दर्शन दें।

जहां पर भगवान ईंट पर खड़े हुए थे वहीं आज उनका विग्रह रूप धरती पर विराजमान हैं। यह पवित्र स्थान आज पुण्डरीकपुर और पंढरपुर कहलाता है। पंढरपुर में आषाढ़ तथा कार्तिक शुक्ल की एकादशी के दिन विशेष पूजा अर्चना होती और लाखों की संख्या में भक्त आते हैं। यहां चंद्रभागा नदी के पार श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभु की बैठक है। यहां से 3 मील दूर एक गांव में जनाबाई का मंदिर है और वह चक्की है , जिसे भगवान ने चलाया था।

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