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महाराजा रणजीत सिंह की इस रानी से खौफ खाते थे अंग्रेज, बेटे से कर दिया था दूर

नई दिल्ली। पंजाब के शासक महाराजा रणजीत सिंह को कौन नहीं जानता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनकी मौत के बाद सिख साम्राज्य का क्या हुआ। आज हम आपको महाराजा रणजीत सिंह की एक रानी के बारे में बताएंगे। जिसने उनके निधन के बाद नसिर्फ शासन की बागडौर संभाली बल्कि बेटे से दूर करने पर ब्रिटिश साम्राज्य को नाकों चने चबवा दिए।
पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह की छोटी पत्नी रानी जिंदा कौर थीं। रानी जिंदा कौर ने पति की मृत्यु के बाद पंजाब का शासन ही नहीं संभाला, बल्कि अंग्रेजों के खिलाफ कठोर नीतियां भी अपनाई। अंग्रेज़ उनसे खौफ खाते थे। इसीलिए ब्रिटिश सरकार उन्हें विद्रोही रानी कहती थी।

रानी जिंदा कौर का जन्म 1817 में हुआ। इनके पिता सरदार मन्ना सिंह कुत्तों की रखवाली किया करते थे।उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह से अपनी बेटी को पत्नी के रूप में स्वीकार करने का अनुरोध किया था। वैसे तो महाराजा रणजीत सिंह ने कई शादियां की थी लेकिन उन्होंने 1835 में जिंदा कौर को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। रानी जिंदा कौर महाराज की सभी पत्नियों में बेहद खूबसूरत थीं। शादी के बाद इन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया। जिनका नाम दिलीप सिंह रखा गया। महाराजा रणजीत सिंह उनमें अपना उत्तराधिकारी की झलक देखते थे।

शादी के चार साल बाद ही 1839 में महाराजा रणजीत की मृत्यु हो गई। इसके बाद पंजाब राज्य में अराजकता का माहौल पैदा हो गया। सत्ता के लिए कई हत्याएं व साजिशें भी रची गईं। उस दौरान उनको महराजा रणजीत सिंह के भरोसेमंद लोगों से विश्वासघात भी मिला। कइयों ने अंदर ही अंदर अंग्रेजों से गुटबाजी कर रखी थी।

इन सबके बीच रानी ज़िन्दाकौर ने लाहौर दरबार के एक शक्तिशाली गुट के समर्थन से उन्होंने 1843 में दिलीप सिंह को 5 वर्ष की आयु में ही पंजाब की गद्दी पर बैठा दिया। बेटे दिलीप सिंह के नाबालिग होने की वजह से वो खुद उनकी संरक्षिका बनी। इसके बाद पंजाब राज्य में वो कुशल शासिका के रूप में उभर कर सामने आईं। जनता उनके शासन से बेहदखुश थी। रानी ज़िन्दाकौर अपने वजीर राजा लाल सिंह की मदद से एक शक्तिशाली सेना का निर्माण किया।
उनके काम को देखते हुए पंजाब राज्य में इन्हें सिख समुदाय की ‘मां’ के ओहदे से भी नवाज़ा गया।

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उनकी नीतियों से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की नींद उड़ा दी। इसके चलते 1845 में ही ब्रिटिश सरकार के खिलाफ प्रथम आंग्ल युद्ध शुरू हो गया। इस युद्ध में कई सरदारों के विश्वासघात की वजह से रानी को हार का मुंह देखना पड़ा था। हालांकि उनकी बहादुरी और दूरदर्शी नेतृत्व से अंग्रेज सरकार उनसे खौफ खाने लगी थी। शायद इसीलिए उन्होंने इन्हें ‘विद्रोही रानी’ भी कहकर संबोधित किया था।

प्रथम आंग्ल युद्ध की समाप्ति के समय रानी व ब्रिटिश शासन के बीच एक संधि हुई थी। इस संधि के तहत वो राजकुमार दिलीप सिंह की संरक्षिका बनी रहीं। इस बीच भी रानी जिंदा अंग्रेजों के खिलाफ षड्यंत्र रचती रहीं। उनकी गतिविधियों के चलते ब्रिटिश सरकार उन्हें संदेह की नज़रों से देखने लगे। अंग्रेजों ने उनके डर से 1848 में उन पर एक अभियोग चलाया। इसके बाद उन्हें लाहौर से हटा दिया गया। जब द्वितीय सिख युद्ध शुरू हुआ तो रानी ज़िन्दा कौर की अनुपस्थिति में पंजाब कमज़ोर पड़ गया था। जिसके चलते पंजाब पर ब्रिटिश सरकार का कब्ज़ा हो गया।
जब उनके बेटे को उनसे दूर लंदन भेज दिया गया। रानी ज़िन्दा कौर को चुनार किले में नज़रबंद कर दिया गया था। साल 1949 में रानी जिंदा एक नौकरानी का भेष बदलकर चुनार किले भाग निकलने में कामयाब रहीं और नेपाल पहुंची थीं। इस दौरान उनके 9 वर्षीय पुत्र दिलीप सिंह को अंग्रेजों ने लंदन भेज दिया था। एक लंबे समय के बाद 1861 में इन दोनों मां और बेटे की मुलाकात संभव हो सकी। जिस वक़्त दिलीप सिंह अपनी मां से मिले वे अपने जीवन के अंतिम पढ़ाव पर थीं। वो एक आँख से नेत्रहीन भी हो चुकी थीं। 1863 में रानी जिंदा कौर ने इंग्लैंड में ही अंतिम सांसे लीं। महाराज दिलीप सिंह उनका अंतिम संस्कार पंजाब में करना चाहते थे, मगर पंजाब में उनके अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं दी गई। इसके बाद दिलीप सिंह अपनी मां रानी जिंदा कौर के शव को लेकर मुंबई आये। वहां गोदावरी नदी के तट पर उनका अन्तिम संस्कार किया।

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