इस गांव में फकीर के आदेश पर सदियों से नहीं बना कोई पक्का मकान, जानें रहस्य

नई दिल्ली। मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले के एक गांव में सदियों से कोई पक्के मकान नहीं बनाता है। गांव में कई करोड़पति लोग भी कच्चे मकान में रहते हैं। कहा जाता है कि अजमेर वाले ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती इबादत के लिए यहां आए थे, तब से गांव के भले के लिए उनके आदेश पर लोगों ने पक्के मकान बनाना बंद कर दिए, बस एक मंदिर और दरगाह पक्की है। किसी ने पक्के मकान बनाए भी तो उनमें रह नहीं सका, और वो खंडहर बन गए ख्वाजा ने कहा था कच्चे घरो में रहो, न अकाल सताएगा न महामारी का प्रकोप आयेगा।

जानकारी के मुताबिक श्योपुर से 20 किमी दूर बसा गांव निमोदा पीर यहां बनी अजमेर वाले ख्वाजा की छोटी दरगाह के लिए चंबल ही नहीं पड़ोसी राजस्थान के दूर दूर तक मशहूर है।
करीब 200 घरों की आबादी वाले इस गांव में एक भी पक्का मकान आज तक नहीं बना है। इसलिए इस गांव को कच्चे मकानों का गांव कहा जाता है।

गांव के किसानों पर पर्याप्त संसाधन हैं कि अपने पक्के मकान बना सकें, लेकिन कोई बनाता नहीं, क्योंकि ख्वाजा का आदेश है, तबसे गांव में पत्थर, ईट और सीमेंट के इस्तेमाल से पक्का मकान बनाने पर पाबंदी हैं। जब भी किसीने भी पक्का मकान बनाने की कोशिश की उसे शारीरिक, आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा।

Gyan Dairy

ग्रामीणों का कहना है कि सदियों पूर्व जब सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अपने भक्ति काल के दौरान यहां आये थे, तब गांव अकाल से जूझ रहा था, तभी बाबा गरीब नवाज ने ग्रामीणों को आन यानि आज्ञा दी थी कि यहां की खुशहाली के लिए अपने घरों को कच्चा ही रखा जाये। बाबा की आज्ञा आज भी सभी मान रहे हैं। जिस वजह से गांव में सूखा, बीमारियां और वैमनस्यता हमेशा दूर रहती है। गांव की नई पीढ़ी कच्चे मकानों में रहकर शर्मिंदगी जरूर महसूस करती हैं, लेकिन उनके लिए भी बाबा की अनोखी आज्ञा मंज़ूर हैं।

इस गांव में दो मंदिर और बाबा की दरगाह ही पक्की इमारत है, जबकि सरकारी स्कूल भी गांव की हद से बाहर बना है। ऐसा भी नहीं है कि यहां किसी ने पक्का मकान बनाने की हिम्मत ना जुटाई हो। कई बार पक्का भवन निर्माण कराते वक्त ही यहां अतिवर्षा, तूफान और सूखे ने गांव को हिलाकर रख दिया। गांव में खण्डहर बने कुछ भवन इसका उदाहरण है।

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