नीति: परिश्रम और ईमानदारी से कमाएं धन, पैसे को लेकर महात्मा विदुर ने कही ये बात

लखनऊ। महाभारत के उद्योगपर्व में महाराज धृतराष्ट्र और महात्मा विदुर के बीच संवाद हुआ। धृतराष्ट्र और विदुर संवाद में महात्मा विदुर ने जो बातें धृतराष्ट्र को बताई थीं उन्हें ही विदुर नीति कहा जाता है। विदुर नीति में बताई गई बातें हजारों साल बाद आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। इनका अनुसरण करके आज भी हम कई परेशानियों से बच सकते हैं। जानिए धन से जुड़ी एक विदुर नीति-

श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति प्रागल्भात् सम्प्रवर्धते।

दाक्ष्यात्तु कुरुते मूलं संयमात् प्रतितिष्ठत्ति।।

यह महाभारत के उद्योगपर्व के 35वें अध्याय के 44वां श्लोक है। इसमें कहा गया है कि अच्छे काम करने से स्थाई लक्ष्मी आती है। परिश्रम और ईमानदारी से किए गए कामों से जो धन मिलता है, उससे ही सुख-शांति बनी रहती है। गलत कामों से मिला धन जीवन में दुख बढ़ाता है। दुर्योधन ने छल से पांडवों से उनकी धन-संपत्ति छीन ली थी, लेकिन ये संपत्ति उसके पास टिक ना सकी।

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महात्मा विदुर ने कहा कि हमें धन का निवेश सही जगह करना चाहिए। अगर हम धन सही कार्यों में लगाएंगे तो अच्छा लाभ मिल सकता है। दुर्योधन ने धन का उपयोग पांडवों को नष्ट करने में किया था, लेकिन उसका धन किसी काम नहीं आया।

विदुर की यह नीति हमें यह सिखाती है कि सुखी रहने के लिए बुद्धिमानी से योजनाएं बनानी चाहिए कि धन कहां खर्च करना है और कहां नहीं, इसका ध्यान रखना चाहिए। आय-व्यय में संतुलन बनाए रखना चाहिए। महाभारत में पांडव दुर्योधन से सबकुछ हार गए थे, इसके बाद उन्होंने अभाव का जीवन व्यतीत किया था, लेकिन वे अभाव में भी सुखी और प्रसन्न थे।

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