Ramayan: इस राक्षसी ने कई बार बचाई माता सीता की जान, कही जाती हैं विभीषण की बेटी

नई दिल्ली। रामायण (Ramayan) के कई चरित्रों के बारे में धर्म ग्रंथों में विस्तार से नहीं बताया गया है। ऐसा ही एक चरित्र है राक्षसकुल में पैदा हुई त्रिजटा का। त्रिटजा ने अशोक वाटिका में रावण की कैद के दौरान माता सीता की बहुत मदद की। त्रिजटा का राक्षसी सेना में बड़ा ओहदा था और महिला सेना की प्रमुख थी। त्रिजटा ने अपने वाकचातुर्य से कई बार माता सीता के प्राण भी बचाए।

त्रिजटा का उल्लेख रामचरित मानस, वाल्मिकी रामायण में कई बार हुआ है। इसके साथ ही दक्षिण एशियाई देशों की रामायण के अलग अलग संस्करण प्रचलित हैं, उसमें उसका उल्लेख कहीं ज्यादा बड़े रूप में हुआ है। जब रावण ने वन से अपहरण करने के बाद सीता को अशोक वाटिका में रखा तो तमाम राक्षसियां उन्हें तरह-तरह से परेशान करती थीं। इनमें एक त्रिजटा ही थी, जो राक्षसियों से भी बचाती थी और साथ में ढांढस भी बढ़ाती रहती थी।

रामचरित मानस और रामायण के अनुसार त्रिजटा राक्षसी विभीषण की बेटी थी। अपने पिता विभीषण की तरह वो भी भगवान श्रीराम की अनन्य भक्त थी। ये भी उल्लेख हुआ है कि मंदोदरी ने उसे खासतौर पर सीता की देखरेख के लिए रखा था।

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जिस दौरान लंका में राम और रावण की सेनाओं के बीच युद्ध हो रहा था, तब त्रिजटा अपने सूत्रों से मिल रही तमाम जानकारियों को सीता तक पहुंचाती थी। जब रावण ने कभी माया के जरिए सीता को भऱमाने की कोशिश की तब भी त्रिजटा ने सीता को सही बात बताई। जब युद्ध के दौरान राम और लक्ष्मण पर मुसीबत आती थी, तो त्रिजटा ही वहां सीता को दिलाने दिलाने वाली थी। उसने सीता से ये भी कहा कि उसने सपना देखा है और उसके अनुसार युद्ध में राम की जीत होगी।

राम चरित की चौपाइयों के अनुसार, त्रिजटा की मां का नाम शरमा था। इस रिश्ते से देखा जाए तो वो रावण की भतीजी लगती थी। जब इस कैद में सीता जी के लिए विरह को सह पाना मुश्किल होने लगा तो उन्होंने खुद की जान देने की बात की। त्रिजटा से कहा कि वो चिता बनाकर सजा दे और उसमें आग लगा दे। ऐसे में त्रिजटा ने बुद्धिमानी से सीता की बात ये कहकर टाल दी थी कि इतनी रात में कहां आग मिलेगी।

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