कलियुग के अंत से जुड़ा है नंदी की मूर्ति का रहस्य, जानें दिलचस्प तथ्य

नई दिल्ली। हमारे देश के मंदिरों में ऐसे अनेकों रहस्य हैं, जिनका आज तक कोई समाधान नहीं निकल पाया है। आज हम आपको ऐसे ही एक रहस्यमयी शिव मंदिर के बारे में बताने जा रहे जिसे सुनकर आप दंग रह जाएंगे। इस शिवमंदिर में मौजूद नंदी महाराज की मूर्ति को लेकर मान्यता है कि एक दिन ऐसा आएगा जब नंदी महाराज जीवित हो उठेंगे, उनके जीवित होते ही इस संसार में महाप्रलय आएगी और इस कलियुग का अंत हो जाएगा।

आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में स्थित यागंती उमा महेश्वर मंदिर में हमारे देश के ऐतिहासिक धरोहरों में से एक है। यह मंदिर जितना अद्भुत है अपने आप में उतने ही रहस्यों को समेटे हुए है। इस मंदिर में मौजूद नंदी महाराज की प्रतिमा लगातार रहस्यमय तरीके से विशालकाय होती जा रही है, जिसकी वजह से यह यागंती उमा महेश्वर मंदिर काफी सुर्खियों में है।

इस यागंती उमा महेश्वर मंदिर में स्थापित नंदी महाराज की प्रतिमा का आकार हर 20 साल में करीब एक इंच बढ़ जाता है। पुरातत्व विभाग के शोध में कहा गया था कि इस मूर्ति को बनाने में जिस पत्थर का इस्तेमाल किया गया था उस पत्थर की प्रकृति बढऩे वाली है। इसी वजह से मूर्ति का आकार बढ़ रहा है। मान्यता है कि यागंती उमा महेश्वर मंदिर में आनेवाले भक्त पहले नंदी की परिक्रमा आसानी से कर लेते थे लेकिन लगातार बढ़ते आकार के चलते अब यहां परिक्रमा करना संभव नहीं है। विशाल होते नंदी को देखते हुए मंदिर प्रशासन ने वहां से एक पिलर को भी हटा दिया है।

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इस मंदिर का निर्माण 15वीं शताब्दी में किया गया था। संगमा राजवंश राजा हरिहर बुक्का ने इस मंदिर को बनवाया था। कहा जाता है ऋषि अगस्त्य इस स्थान पर भगवान वेंकटेश्वर का मंदिर बनाना चाहते थे पर मंदिर में मूर्ति की स्थापना के समय मूर्ति के पैर के अंगूठे का नाखून टूट गया। इस घटना की वजह जानने के लिए अगस्त्य ने भगवान शिव की तपस्या की। उसके बाद भगवान शिव के आशीर्वाद से अगस्त्य ऋषि ने उमा महेश्वर और नंदी की स्थापना की थी।

इस यागंती उमा महेश्वर मंदिर परिसर में एक छोटा सा तालाब है जिसे पुष्करिणी कहा जाता है। इस पुष्करिणी में लगातार नंदी के मुख से जल गिरता रहता है। लाख कोशिशों के बाद भी आज तक कोई पता नही लगा सका की पुष्करिणी में पानी कैसे आता है। ऐसी मान्यता है की ऋषि अगस्त्य ने पुष्करिणी में नहाकर ही भगवान शिव की आराधना की थी। मंदिर परिसर में कभी भी कौवे नही आते है। ऐसी मान्यता है कि तपस्या के समय विघ्न डालने की वजह से ऋषि अगस्त ने कौवों को यह श्राप दिया था कि अब कभी भी कौवे मंदिर प्रांगण में नही आ सकेंगे।

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