इस श्मसान घाट में रात भर नाचती हैं वैश्याएं, मुर्दों को देना पड़ता है टैक्स

नई दिल्ली। हमारे देश में विभिन्न प्रकार की मान्यताएं और परम्पराएं निभाई जाती हैं। इनमें कई तो ऐसी मान्यताएं हैं, जिनके बारे में सुनकर लोग दंग रह जाते हैं। ऐसे ही भगवान शिव की नगरी काशी के मणिकर्णिका श्मशान घाट के बारे में अनोखी मान्यता है कि यहां चिता पर लेटने वाले को मोक्ष मिलता है। ये इकलौता श्मशान जहां चिता की आग कभी ठंडी नहीं होती। यहां लाशों का आना और चिता का जलना कभी नहीं थमता। मणिकर्णिका घाट पर एक भी ऐसा दिन नहीं जाता, जब यहां 200-300 शवों का दाह संस्कार न हो। मान्यता है कि मणिकर्णिका घाट पर जिस दिन चिता नहीं जली वह काशी के लिए प्रलय का दिन होगा।

मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओं के बीच चिता भस्म से खेली जाती है होली और दूसरी चैत्र नवरात्री अष्टमी को मणिकर्णिका घाट पर, जलती चिताओं के बीच, मोक्ष की आशा में बार डांसर रात भर नाचती हैं। दरअसल चिताओं के करीब नाच रहीं लड़कियां शहर की बदनाम गलियों की रहने वाली होती हैं।

मणिकर्णिका घाट पर वैश्याएं मोक्ष प्राप्ति की इच्छा से आती हैं। माना जाता है कि अगर इस एक रात ये जी भरके नाचेंगी तो फिर अगले जन्म में इन्हें वैश्या बनने का कलंक नहीं झेलना पड़ेगा। इनके लिए जीते जी मोक्ष पाने की मोहलत बस यही एक रात देता है। साल में एक बार ये मौका आता है चैत्र नवरात्र के आठवें दिन। इस दिन श्मशान के बगल में मौजूद शिव मंदिर में शहर की तमाम वैश्याएं जुटती हैं। इसके बाद भगवान शिव के सामने जी भरके नाचती हैं। यहां आने वाली तमाम वैश्याएं खुद को खुशनसीब मानती हैं।

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यहां मुर्दे वसूला जाता है टैक्स
मणिकर्णिका श्मशान घाट पर आने वाले हर मुर्दे को चिता पर लिटाने से पहले बाकायदा टैक्स वसूला जाता है। दरअसल यहां टैक्स वसूलने की शुरुआत राजा हरिश्चन्द्र के समय में हुई। हरिश्चन्द्र ने तब एक वचन के तहत अपना राजपाट छोड कर डोम परिवार के पूर्वज कल्लू डोम की नौकरी की थी। इसी बीच उनके बेटे की मौत हो गई और बेटे के दाह संस्कार के लिये उन्हें मजबूरन कल्लू डोम की इजाजत मांगनी पडी। चूंकि बिना दान दिये तब भी अंतिम संस्कार की इजाजत नहीं थी लिहाजा राजा हरीशचंद्र को मजबूरन अपनी पत्नी की साड़ी का एक टुकडा बतौर टैक्स कल्लू डोम को देना पडा। बस तभी से शवदाह के बदले टैक्स मांगने की परम्परा मजबूत हो गई।

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