इस मंदिर में लगातार बढ़ रहा है भगवान शिव की मूर्ति का आकार, जानें रहस्य

नई दिल्ली। पंजाब राज्य के कलानौर में एक ऐसा प्राचीन शिव मंदिर है जिसमें शिवलिंग नहीं बल्कि स्वयंशम्भू विराजमान हैं। कहते हैं भगवान शिव का यह
शिलारूपी शरीर निरन्तर बढ़ता जा रहा है। इतिहासकारों का कहना है कि 1388 तक इस मंदिर का नाम महकनेश्वर था। इसके बाद 1350-55 में आये भूकंप के कारण यह गिर गया और 1560 तक धरती के नीचे ही दवा रहा।

कहा जाता है कि कलानौर किले के इस हिस्से के समीप शाही घुड़साल थी। धरती के नीचे यह मंदिर घुड़साल में जाने वाले रस्ते में पड़ता था जो घोडा मंदिर वाले स्थान के ऊपर से गुजरता था वह अंधा हो जाता था,जबकि आस-पास से गुजरने वाले घोड़े ठीक रहते थे। शाही मनसबदार और घुड़साल के सेवादार इससे बहुत परेशान थे क्योंकि उन दिनों घोड़े के अलावा आने जाने के साधन अत्यंत कम थे। जब घुड़साल के सेवादारों की समझ में कुछ न आया तो उन्होंने देहली में अकबर तक यह सन्देश पहुंचाया। यह सुनकर अकबर स्वयं यहां आया। अकबर ने अपना घोडा उस स्थान से गुजार कर देखा। जब उसका घोडा भी अंधा हो गया तो वह हैरान रह गया। उसने वहां खोदाई करने का आदेश दिया। खुदाई में वहां से मंदिर के अवशेष मिले जब खुदाई सात -आठ फुट नीचे गयी तो वहां उन्हें अधलेटे व्यक्ति के आकर की एक काली शिला मिली। शंकर भगवान की पिंडी नंगी हो गयी। खुदाई करने वाले चिलाये “यह तो काला नूर है” इसे देखकर अकबर ने कहा की यह तो मज़ार है। वहां एकत्रित हुए हिंदुओं का कहना था की यह महकानेश्वर महाराज की देह है। अकबर ने इसे हथोड़े से तुड़वाना आरम्भ कर दिया। परन्तु जैसे ही इस शिला पर हथोड़े की चोट पड़ती वह टूटने की बजाए चौड़ा होता जाता। बादशाह ने छेनियाँ मंगवाई और इसे तोड़ने का प्रयास किया। मजदूरों ने जैसे ही इस पर छेनी की चोट की तो शिला से एक जीभ निकल आई। जो मजदूर प्रतिमा को काटता था वह बेहोश हो जाता था। शिला पर छेनी के निशान आज भी मौजूद हैं। अकबर ने नगर के हिन्दू पंडितों को बुलाया और इस स्थान के बारे में जानकारी ली। पंडितों ने अकबर को बताया कि यहाँ सदियों पुराना महकानेश्वर जी का मंदिर था और अधलेटे व्यक्ति के रूप में स्वयंशम्भू हैं। अकबर को इस बात का पता चला तो उसने स्वयंशम्भू महाराज की पुनः प्रतिष्ठा करवाई। उस समय अकबर ने उस स्थान पर मकबरे के आकार की इमारत बनवाकर हिंदुओं के हवाले कर दी थी। इसके बाद एक बार महाराजा रणजीत सिंह मंदिर गए। उन्होंने मकबरे के स्थान पर मंदिर बनवाने की मन्नत मांगी। वह अफगानिस्तान फतेह करके वापस आए तो लाहौर में उनका देहांत हो गया। राज कुमार खड़क सिंह पिता की मन्नत की बात जानते थे। उन्होंने मकबरा तोड़कर इसके स्थान पर मंदिर बनबाया। उन्होंने मंदिर के नाम 200 एकड़ जमीन भी लगबाई थी। सदियों से मंदिर की सेवा कर रहे परिवार के महंत साई दस् ने बताया की स्वयशम्भू का शिला रूपी शरीर धीरे-धीरे फैल रहा है।

उन्होंने बताया की जब बह छोटे से थे तो चढ़ावे के पैसे इकठे करने के लिए शिला के एक तरफ से आसानी से निकल जाते थे। आज उस तरफ से हाथ भी नहीं निकलता है साल में यह कितना बढ़ता है। इसकी कभी पैमाइश नहीं की गयी परन्तु यह निश्चित है की स्वयं शम्भू का आकर बढ़ रहा है यह मंदिर भारत-पाक सीमा से केवल 7-8 किलो मीटर के फासले पर है। 1965 और 1971 के दोनों ही युद्धों के समय इस मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है।

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ये है मान्यता
पुराणों अनुसार जब गणेश जी और कार्तिकेय के मध्य रिद्धि-सिद्ध प्राप्त करने की होड़ लगी तो शिव -पार्वती ने कहा की त्रिलोकी का चक्र लगाकर जो सबसे पहले आएगा बही उसका हक़दार होगा इतना सुनते ही कार्तिकेय त्रिलोक का चक्र लगाने निकल पड़े थे। जब बह यहां से 4-5 किलो मीटर के फैसले पर अचल धाम में विश्राम कर रहे थे तो नारद जी वहां पहुंच गए। उन्होंने कार्तिकेय से पूछा की बह इधर कैसे घूम रहे हैं ! तब कार्तिकेय ने कैलाश पर हुआ सारा वृतांत नारद जी से बताया। तब नारद जी ने कहा की शर्त तो गणेश जीत चुके हैं और उन्हीं ऋद्धियों-सिद्धियों का धारक घोषित भी किया जा चुका है। यह सुन कर कार्तिकेय गुस्से में आ गए। उन्होंने निर्णय किया की वापस कैलाश नहीं जायेंगे। देवता उन्हें मनाने आये परन्तु वह कैलाश जाने के लिए राजी नहीं हुए। देवता भगवान शिव के पास गए और उन्हें कार्तिकेय को मनाने के लिए राजी किया। शंकर भगवान यहां इस स्थान पर आकर ठहरे थे। यहीं पर उन्होंने कार्तिकेय को बुलाया था और विधि का विधान समझया था। जिसके बाद कार्तिकेय का का गुस्सा शांत हुआ था। तब उन्होंने कहा था की मैं यहां महकानेश्वर के नाम से जाना जाएगा।

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