ये है भारत का सबसे प्राचीन किला (Fort), जानें दिलचस्प इतिहास

नई दिल्ली। हमारे देश में ऐसे हजारों किले (Fort) हैं, जो हमारी समृद्ध विरासत को संजोये हुए हैं। ऐसा ही एक किला हिमाचल प्रदेश में स्थित है। इस किले को कांगड़ा किले (Kangra Fort) के नाम से जाना जाता है। कांगड़ा किले को देश का सबसे प्राचीन किला माना जाता है। कांगड़ा दुर्ग हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा कस्बे के बाहरी क्षेत्र में फैला हुआ एक प्राचीन दुर्ग है। इस दुर्ग का उल्लेख सिकन्दर महान के युद्ध सम्बन्धी रिकार्डों में भी दर्ज है। इस किले के ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में विद्यमान होना सिद्ध होता है। कांगड़ा, धर्मशाला से २० किमी दूर है।

इस किले को कांगड़ा राज्य (कटोच वंश) के राजपूत परिवार ने बनवाया था। कटोच वंश के राजा प्राचीन त्रिगत साम्राज्य के वंशज माने जाते थे। इस वंश का उल्लेख महाभारत और पुराणों में भी है। कांगड़ा का किला हिमाचल प्रदेश में मौजूद किलों में सबसे विशाल और भारत में पाये जाने किलो में सबसे पुराना किला है। विक्रम संवत 1615 में, मुग़ल सम्राट अकबर ने इस किले की घेराबंदी की थी लेकिन उसकी सेनाएं इस किले को जीत नहीं सकी। इसके पश्चात संवत 1620 में अकबर के पुत्र जहांगीर ने चंबा के राजा को मजबूर करके इस किले पर कब्ज़ा कर लिया। मुग़ल सम्राट जहांगीर ने सूरज मल की सहायता से अपने सैनिकों को इस किले प्रवेश करवाया था।

कटोच के राजाओं ने मुग़ल शासन के कमजोर नियंत्रण और मुग़ल शक्ति की गिरावट के कारण लगातार मुग़ल नियंत्रित क्षेत्रों को लुटा। संवत 1789 में राजा संसार चंद—2 ने अपने पूर्वजों के इस प्राचीन किले को बचा लिया। महाराजा संसार चंद ने गोरखाओं के साथ कई युद्ध किये थे जिनमे एक ओर गोरखा और दूसरी ओर सिख राजा महाराजा रंजीत सिंह होते थे। संसार चंद इस किले का प्रयोग अपने पडोसी राज्य के राजाओं को कैद करने के लिए किया था जो उनके खिलाफ हुए षड्यंत्र का कारण बन गया।

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सिखों और कटोचो के बीच हुए एक युद्ध के दौरान, किले के द्वार को आपूर्ति के लिए खुल रखा गया था। संवत 1806 में गोरखा सेना ने इस खुले द्वार से किले में प्रवेश कर लिया। ये सेना महाराजा संसार चंद और महाराजा रंजीत सिंह के बीच एक गठबंधन का कारण बनी। इसके बाद संवत 1809 में गोरखा सेना पराजित हो गयी और अपनी रक्षा करने के लिए युद्ध से पीछे हट गयी और सतलुज नदी के पार चली गयी। इसके पश्चात संवत 1828 तक ये किला कटोचो के अधीन ही रहा क्योकि संसार चंद की मृत्यु के पश्चात रंजीत सिंह ने इस किले पर कब्ज़ा कर लिया था। अंत में सं 1846 में सिखों के साथ हुए युद्ध में इस किले पर ब्रिटिशों ने अपना शासन जमा लिया। परन्तु 4 अप्रैल 1905 में आये एक भीषण भूकम्प आया जिसमे उन्होंने इस किले को छोड़ दिया।

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