
भूटान में पवित्र स्तूपों के निर्माण में शामिल होने पहुंचे किरेन रिजिजू
करुणा के मंत्र और पारंपरिक तुरहियों की गूंज के साथ भूटान में स्तूपों के निर्माण की शुरुआत होगी। इस पवित्र कार्यक्रम की शुरुआत रविवार को होगी।
भूटान के गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी में 108 जंगचूब चोर्टेन (स्तूपों) के निर्माण की शुरुआत होगी। इस पवित्र कार्यक्रम की शुरुआत 58 पारंपरिक तुरहियों (ट्रम्पेट्स) की गूंज के साथ होगी। इसे आत्माओं और देवताओं के आह्वान करने के लिए बजाया जाता है। इसके साथ ही करुणा के मंत्र ‘ओम मणि पद्मे हुम’ का सामूहिक जाप भी होगा।
मंत्र के जाप के साथ होगी शुरुआत
यह मंत्र तिब्बती बौद्ध धर्म में सबसे प्रसिद्ध है और इसका व्यापक रूप से जाप किया जाता है। इस समारोह में भारत का प्रतिनिधित्व केंद्रीय संसदीय कार्य और अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू करेंगे।
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट में इसकी जानकारी दी। उन्होंने लिखा कि पारो हवाई अड्डे पर भूटान के प्रधानमंत्री महामहिम दाशो शेरिंग तोबगे, विदेश मंत्री ल्योंपो डी. एन. ढुंगेल, विदेश सचिव, और भूटान तथा भारत के राजदूतों द्वारा गर्मजोशी से स्वागत किए जाने पर मैं सम्मानित महसूस कर रहा हूं।
108 स्तूपों के निर्माण के बनेंगे साक्षी
उन्होंने कहा कि वो 108 स्तूपों (जंगचूब चोर्टेन) की स्थापना के भव्य समारोह का साक्षी बनने के लिए गेलेफू जा रहे हैं। यह पहल भूटान के महामहिम राजा की परिकल्पना है। यह गहरे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व का क्षण है। इस दौरान जब रिजिजू समारोह के लिए गेलेफू पहुंचे, तब भूटान के प्रधानमंत्री दाशो शेरिंग तोबगे ने खुद गाड़ी चलाई। इस पर रिजिजू ने इस क्षण को बहुत ही सम्मान की बात बताया।
बन सकता है गिनीज रिकॉर्ड
भूटान के सबसे बड़े आध्यात्मिक आयोजन में एक ही जगह पर एक साथ 108 स्तूपों की स्थापना और उनका अभिषेक किया जाएगा। इसको लेकर ऐसी संभावना जताई जा रही है कि शायद गिनीज रिकॉर्ड भी बन सकता है।
बौद्ध धर्म का पवित्र समारोह
इस प्रक्रिया और समारोह की महत्ता को बताते हुए भूटान के आधिकारिक राज्य मठ निकाय ‘सेंट्रल मोनास्टिक बॉडी’ के प्रधान सचिव चोटेन दोरजी ने बताया कि यह वज्रयान बौद्ध धर्म का एक पवित्र समारोह है, जिसे स्वयं बुद्ध के जागृत होने के रूप में देखा जाता है। एक स्तूप को दिव्य शक्ति से संपन्न होकर एक पवित्र स्मारक बनने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यह प्रक्रिया रविवार स्तूपों की स्थापना के साथ शुरू होती है और उनके पूरा होने के बाद उनका अभिषेक किया जाता है।
ये है इसका इतिहास
स्तूप बनाने की परंपरा बौद्ध धर्म की एक पवित्र प्रथा है, जिसमें ऐसे वास्तुशिल्प स्मारक बनाए जाते हैं जो बुद्ध के प्रबुद्ध मन, शरीर और चेतना के प्रतीक होते हैं। यह परंपरा ईसा पूर्व 5वीं शताब्दी में गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण (निधन) के तुरंत बाद शुरू हुई थी।
बुद्ध के अंतिम संस्कार के बाद बचे अवशेषों को आठ हिस्सों में बांटा गया और उन्हें आठ मिट्टी के टीलों के नीचे दबा दिया गया। सम्राट अशोक ने इन मूल अवशेष वाले टीलों को खुलवाया, बुद्ध के अवशेषों को 84,000 हिस्सों में विभाजित किया और पूरे साम्राज्य में बड़े पैमाने पर स्तूपों के निर्माण की शुरुआत की।
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